Saturday, 31 December 2016

एक झूठ को सच की तरह जी रहा हूँ
आग को पानी की तरह पी रहा हूँ
जलते हुए लोगों से जो बच गया
वह मैं हूँ आदमी के शक्ल में
आज के आदमी के काबिल नहीं
किसी मूल्य के जीवाश्म सा
संग्रहालयों में चमकता हुआ
वर्तमान में अतीत की तरह
स्वयं में व्यतीत की तरह
खुद की उम्र से घायल हूँ
किसी  वृद्ध  नर्तकी का पायल हूँ
अपने वजूद का कमजोर पक्ष
खूनी हवाओं से बचाते हुए
जिक्र में बेहद नरम हूँ
मिज़ाज़ में गरम हूँ
 अनसुलझा भरम हूँ
अनिल कुमार शर्मा
31/12/2016

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