Sunday, 22 January 2017

एक कहानी सी  छलक आती है
तुम्हारे उद्द्बुद्ध चेहरे से
गुलाबी होठों  पर गुनगुनाती सी
कपोल कोमल पन्नों की तरह खुलते है
अलकों के झिलमिलाते  हर्फ़ मिलते हैं
दीप्त नयनों से निकलते अंशु
प्रभात के आलोक में आह्लादित
कुसुमित कली पर तुहिन बिंदु से
तप्त हृदय को शीतल करते हुए
नव जीवन का जैसे विहान होता है
सौन्दर्य में खिला जगत -जहान होता है
उम्र का वह सुन्दर पड़ाव
छबि के आलोक से समृद्ध
प्रकृति की सम्पूर्ण आकर्षण को समेटे हुए
कितने कथाओं में आवृत है
सत्यवती शकुन्तला उर्वशी मेनका
अनंग और शिव का तीसरा नेत्र
अर्द्धनारीश्वर की परिणीत में
कथा का काव्य लय
रागमय ध्वनित छंद
वही है कालातीत द्वन्द ।
अनिल कुमार शर्मा
22/01/2017



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