Sunday, 12 February 2017

वह अपनी भाषा में बोलता है
मैं अपनी भाषा में सुनता हूँ
शब्दों की प्रतीति ऐसी है
विभिन्न अर्थों को  गुनता हूँ
 अर्थ और आशय की दूरी
अपनी स्थितियों की मजबूरी
भाषायी पाखंडों की धुरी
लपलपाती जीभ से
गिरते हुए नमकीन शब्द
मिठास के आभास में
गुमसुम और निःशब्द
 क्यों  ज़मीन की बात खोती है
ज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखना
हवा में खड़े होकर हवा को फेंकना
आखिर बुनियाद कहाँ पर है ?
अब तो भरोसे का तेवर
विश्वास को छलता है
सत्याभास गढ़ते हुए
झूठ में पलता है
यह जमाना
किस आग में जलता है ?
अनिल कुमार शर्मा
१३/०३/२०१७







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