Wednesday, 1 March 2017

 उसकी  संवेदनाओं से ज्यादा
उसके संवेदनामय शब्द बोलते है
किसी बकबक प्रेम की तरह
जो किया तो  कम किन्तु
दिखाया ज्यादा जाता है
कौन खोता कौन पाता है
उम्र के रासायनिक परिवर्तन में
हृदय में उठती  तरंगमालायें
क्यों विवश करती है मुझे
सिर्फ तुम्हारे लिए अचेतन में
कोई अंकुर फूटने लगता है
भावना की उर्वर भूमि पर
जीवन का  ऊर्जा प्रवाह
स्वप्निल आकर्षण में आबद्ध होकर
क्यों सिर्फ तुझे ही निहारता है
तुम्हारा ही स्वरुप निखारता है
स्वयं को खोने पर
तुझे पाने का अस्तित्व हूँ
एक अधूरा व्यक्तित्व हूँ
पूर्णता की तलाश में
सिर्फ तुझे ही ढूंढता हूँ
मन की बेचैनियाँ
हृदय की धङकन
दिवा स्वप्न में खो जाना
सिर्फ प्रेम का अस्तित्व हो जाना
मुक्ति का द्वार खटखटाना
किसी आनंद में छटपटाना
तुम्हारे अस्तित्व में स्वयं को पाना
प्रियतम के प्रेम में नहाना
जीवन का सार्थक हो जाना
प्रेम दे कर प्रेम पाना
क्या ज़माने में सम्भव है
ऐसा हो जाना ?
अनिल कुमार शर्मा
०१/०३/२०१७



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