Sunday, 26 March 2017

कहते है वक्त भी करवट लेता है
कभी घूरे के दिन भी फिरते है
लोग पके आम की तरह गिरते हैं
काले बादल भी घिरते है
कभी -कभी समय चोट देता है
और वक्त हिसाब भी लेता है
पाँव तले ज़मीन खिसकती है
जिंदगी गुमनाम सिसकती है
वक्त के मार खाये हमसफ़र
इस वक्त से फरियाद न कर
याद रखना कभी कभी वक्त
यूँ ही मुट्ठी में आ जाता है
वक्त के जख्म को खा जाता है
वक्त तो कभी  घाव भर देता है
और कोई जख्म हरा कर देता है
दोस्त यह वक्त हमारा है
जिसे नींद में हमने मारा है
अब वक्त आ गया है जागने का
लंबी नींद त्यागने का
रोशनी के धोखे में
हमने वक्त गँवाया  है
हर वक्त धोखा खाया है
एक चोट को दूसरे चोट से
नमक मिर्च लगाकर सहलाया है
एक भ्रम में खुद को फुसलाया है
अपना और तुम्हारा वक्त खाया है
दोस्त अब हम ज़मीन पर उतर जाये
ज़मीन को पहले ज़मीन बनायें  ।
अनिल कुमार शर्मा
26/03/2017



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