Saturday, 18 March 2017

बंजर विचारों में कितना पानी दोगे
उकठे दरख्तों में कहाँ से हरियाली दोगे
लाल सियार हुआँ -हुआँ करता है
घंटे -घड़ियाल से डराते हुए डरता है
जंगल की घास लाल दांतों से चरता है
मरती हुई व्यवस्था में मरता है
जिंदगी के सपने दिखाने में
मौत का जाल बिछाने में
हक़ीक़त को यूँ ही भुलाने में
विचारधारा को भुनाने में
टुकड़े - टुकड़े होता है
अपनी अस्मिता खोता है
अपने जेहन में सवाल अब भी उठता है
रोशनी के छलावे में कौन किसको लुटता है
रास्ते भी हैं और ठोकर भी हैं
हँसते हुए भी है और रो कर भी हैं
यह दुनिया आदमी की गढ़ी हुई जाल है
समृद्धि देखते हुए हो रही कंगाल है
क्यों जिंदगी  बन रही इतनी जंजाल है
वे तो हमारी जमीन पर हमारे लिए सपने बोते है
और फसल पकने पर अपने ही हिस्से में काट लेते है
हमारे और अपने बीच में एक फासला बाँट देते है
मैं तो इन फासलों में झूल रहा हूँ
खुद को भुलाते हुए भूल रहा हूँ
वक्त के साथ घुल रहा हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
19/03/2017



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