Saturday, 25 March 2017

 कितना खलता है कुछ होते होते रह जाना
किसी बुनियाद का बनते बनते ढह  जाना
खूबसूरत ईमारत के सपनों का बह जाना
कई बार मैं भी होते होते रह जाता हूँ
चेहरों  की बाढ़ में गुमनाम बह  जाता हूँ
एक चेहरे से दूसरे चेहरे में ढलता हूँ
फौलादी  भ्रम लिए मोम सा पिघलता हूँ
ज़माने का जहरीला  घूँट निगलता हूँ   
आदमी के जिंदगी में इतना जहर क्यों है
आखिर वीरान होता यह शहर क्यों है
अस्तित्व जीने की एक अजीब  मर्यादा है
पूंछ उठा कर देखो तो सबके  सब मादा है
सूत्र में उच्च विचार और जीवन सादा है
व्यवहार में ओढा  विसंगतियों का लबादा है
तर्क तो  बहुत कम विश्वास ज्यादा है
कटोचता है उम्मीदों का धरा का धरा रह जाना
ग़ाज़ीपुर से सिंघासन का गोरखपुर बह जाना
कितना खलता है कुछ होते होते रह जाना
अनिल कुमार शर्मा
२५ /०३/२०१७



 


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