Friday, 3 March 2017

जनता और नेता के  मौसम में
भाषणों की  फसल तैयार है
मालदार  खिलाफ मालदार है
भाई साहब आपका क्या विचार है ?
समझ में नहीं आता कि
मैं नागरिक हूँ या मुद्दा हूँ
न घर का न घाट का
सिर्फ धोबी का कुत्ता हूँ
अब बहारें इस कदर आयीं  हैं
आगे कुआँ तो पीछे खाई है
यह कौन सी अँगड़ाई है
कौन काट रहा मलाई है ?
जनता जनार्दन में जाति का वर्द्धन है
 किसके फंदे में फँसी किसकी  गर्दन है
अँधेरे में रोशनी की बात सुनाई देती है
किन्तु एक ढिबरी भी नहीं दिखाई देती है
पालिशदार जबान से निकलते हुए रंगीन शब्द
मेरे घायल कान में बज़बज़ाते हैं
पाले बदलकर वे सपने दिखाते हैं
किन्तु हक़ीक़त कुछ और है
भाई साहब यह कौन सा दौर है ?
अनिल कुमार शर्मा
03/03/2017

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