एक देश में कई देश देखा
लाइन में खड़ा दरवेश देखा
जड़ खोदकर फल इतरा रहा है
किसकी ज़मीन खा रहा है
भस्मासुर गा रहा है
गंगाजल बेचकर
नमामि गंगे गा रहा है
लक्ष्मी के दरबार में
श्रीहीनता का दौर है
दिवंगत धन के बोझ से
निजात पा कर पेट खाली है
दुरभिसंधि की जुगाली है
देश में खड़ी भूखी भीड़ को
कोई अजूबा देश दिखा रहा है
वह तो देश के लिए ही
पोशाक बदलते हुए जी रहा है
हमें देश के लिए दरिद्र हो कर
लाइन में मरना सिखा रहा है
उसकी हर बात में अपना देश आता है
आंख में धूल झोंककर
कोई अजीब विकास दिखाता है
अपनी अपनी डफली
अपना अपना राग बजाता है
अनिल कुमार शर्मा
१९/११ /२०१६
लाइन में खड़ा दरवेश देखा
जड़ खोदकर फल इतरा रहा है
किसकी ज़मीन खा रहा है
भस्मासुर गा रहा है
गंगाजल बेचकर
नमामि गंगे गा रहा है
लक्ष्मी के दरबार में
श्रीहीनता का दौर है
दिवंगत धन के बोझ से
निजात पा कर पेट खाली है
दुरभिसंधि की जुगाली है
देश में खड़ी भूखी भीड़ को
कोई अजूबा देश दिखा रहा है
वह तो देश के लिए ही
पोशाक बदलते हुए जी रहा है
हमें देश के लिए दरिद्र हो कर
लाइन में मरना सिखा रहा है
उसकी हर बात में अपना देश आता है
आंख में धूल झोंककर
कोई अजीब विकास दिखाता है
अपनी अपनी डफली
अपना अपना राग बजाता है
अनिल कुमार शर्मा
१९/११ /२०१६
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