Saturday, 19 November 2016

एक देश में कई देश देखा
लाइन में खड़ा दरवेश देखा
जड़ खोदकर फल इतरा रहा है
किसकी ज़मीन खा रहा है
भस्मासुर गा रहा है
गंगाजल बेचकर
नमामि गंगे गा रहा है
लक्ष्मी के दरबार में
श्रीहीनता का दौर है
दिवंगत धन के बोझ से
निजात पा कर पेट खाली है
दुरभिसंधि की जुगाली है
देश में खड़ी भूखी भीड़ को
कोई अजूबा देश दिखा रहा है
वह तो देश के लिए ही
पोशाक बदलते हुए जी रहा है
हमें देश के लिए दरिद्र हो कर
लाइन में मरना सिखा रहा है
उसकी हर बात में अपना देश आता है
आंख में धूल झोंककर
कोई अजीब विकास दिखाता  है
अपनी अपनी डफली
अपना अपना राग बजाता है
अनिल कुमार शर्मा
१९/११ /२०१६


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