Tuesday, 8 November 2016

 वह यही था सच जो
युगों के ज्ञान के इलाके में
बुद्धि के उबड़ -खाबड़ पगडंडियो पर
चलता हुआ अँधेरे से उजाले की ओर
और वह उजाला भी युगान्त के बाद
बने मठों के अँधेरे में ढलता गया
जैसे तेज आँखों में मोतियाबिन्द हो गया हो
खुद के परदे में  समूचा दृश्य खो  गया हो
पर्दा हिलता है  तो लगता है संस्कृति हिल रही है
बनायी हुई शुद्धता में कोई अशुद्धि मिल रही है
 यही घोंघे की घोंघे में स्वघोषित क्रान्ति है
विचित्र ज्ञान के चमक की भ्रान्ति है
प्रकृति के विरोध में  उगी पवित्रता की धुंध में
ज्ञान और विज्ञानं के  निर्बाध अन्धाधुन्ध में
बाजार बनते धर्म और विज्ञानं की उपलब्धियाँ
मानव के उपभोक्ता होने तक सिमित है
विज्ञापनों में अवतार उत्पादों पर चिपके है
गुरूजी भी विचित्र संदिग्धता में लिपटे हैं
आस्था और बाजार का घाल मेल है
महर्षि भी बेचता कडुवा तेल है
हे भगवान यह कैसा खेल है ।
अनिल कुमार शर्मा
08/11/2016







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