Wednesday, 9 November 2016

लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है
जनता में जनता का ही हिस्सा है
और उस हिस्से का कोई किस्सा है
बासी अख़बारों की तरह योजनाएँ
रोज काले चश्मों से पढ़ी जाती हैं
समाधान भी विचित्र गढ़ी जाती है
पेट की आग पर पूंजी पक रही है
बटलोई में कोई राज ढक रही है
जो तिजोरी में बंद है वह सफ़ेद है
जेब से जो बच गया वह  काला है
उसी पर तो चल रहा बर्छी भाला है
नज़र में अब तो बेचारी लहरें है
गहरे समंदरों पनडुब्बियां सुरक्षित है
झोपड़ियों के उड़ाने के विधान में
हवेलियाँ तो सदा संरक्षित हैं
बिकी हुई सहानुभूतियों को पढ़ते हुए
न बिकने वाला एक दर्द उभर आता है
रंगीन रोशनी में  कुछ यूं ही छटपटाता है
विशुद्ध रोशनी की तलाश में गुम हो जाता है
अब ज़मीनी हक़ीक़त कहाँ खो रही है
लाल बुझक्कड़ की सरकार में
सनसनी ही सनसनी हो रही है ।
अनिल कुमार शर्मा
09/11/2016



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