Sunday, 14 August 2016

अब बासी शब्दकोशों पर
फफूंद की तरह उगे छन्दों में
उलझी हुई कविता
दाद खाज की तरह खुजलाती है
अंतःवस्त्र खोलकर
गुप्तांग दिखाती है
नंगे समय का यह नंगा सच है
ऊलजलूल सी पुरस्कार में गच है
इस बंद समय में कुछ खुलता है
उद्देश्यहीन भी उद्देश्य में झूलता है
फाटक के बाद दरवाजा
दरवाजे  के बाद खिड़की
खिड़की के पल्ले बंद हैं
कली मधुकर और मकरंद हैं
अब तो कविता कातिक की कुतिया है
आलोचक उसपर लपलपाता कुत्ता है
सौन्दर्य पर ऊगा बदजात  कुकुरमुत्ता है
अंधे समय का उदय होता प्रकाश है
पोएट्री मैनेजमेंट का बिग बॉस है
समय और सौन्दर्य से हैट कर खड़ी है
कविता किसी बिस्तर में पड़ी है
पुरस्कार की फूलझड़ी है ।
अनिल कुमार शर्मा
१४ / ०८ / २०१६






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