Tuesday, 16 August 2016

मित्र जो देखते हो
उसे उसी तरह कह दो
नमक -मिर्च की जरुरत भी नहीं है
वह जंगली फूल की तरह खिलेगा
किसी घाव को छिलेगा
इंद्रधनुष के रंग में बिखरी हुई छटा
दुर्भाग्य की घिरती हुई काली घटा
कनफटा नकफटा मुंहफटा
सब छू मंतर हो जाएंगे
जब स्थिति को हम समझ पाएंगे
इस भाषा की व्यवस्था में
जो कहने की आदत है
सूखे शब्दों से बने उलझे वाक्य
संज्ञा सर्वनाम विशेषण की   परिधि में
क्रिया के बाद प्रतिक्रिया की भी गुंजाइश है
एक भाषाई नुमाइश  है
देरिदा तुम्हारी क्या फरमाइश है
शब्दों की  पकड़ से छूटते हुए अर्थ
क्या गढ़ पाएंगे नए शब्दो को
क्या प्रतिष्ठा मिल पायेगी उन
उपेक्षित तिरष्कृत दलित अपशब्दों को ?
महाआख्यान की वेदी पर
निर्बलों  की दी गयी बलि
क्या मरी हुई जिंदगी में
नयी शक्ति का संचार कर पायेगी ?
कुछ टूटे पड़े वाक्य  अभी बाकी हैं
यह रिक्त स्थानों की उलझी झाँकी  है
अब तो  मैं  रोशनी में से रोशनी छाँटता  हूँ
तमाम बंधनों को काटता हूँ
लगता है कोई खाई पाटता हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
16/08/2016




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