Monday, 29 August 2016

इतना सब  कुछ होने के बाद भी
वह नहीं हुआ जो होना चाहिए था
 रोनी सूरत तो वही है
हँसी  न जाने कहाँ गायब है
उस अभियान में
चरखे की लय पर
झोपड़ी   भी गाती थी
हवेली भी गुनगुनाती थी
बनती हुई नयी सड़क पर
कोई खूबसूरत सपने बिछाती थी
वे देखे गए सुनहले सपने
सपने में भी सबके अपने थे
अब तो अपनों में भी
परायों जैसी तासीर मिलती है
लगता है जैसे कोई नींव हिलती है
यह इमारत बुलंद है
बस रोशनी ही मंद है
मीरज़ाफर और जयचंद हैं
खेत खलिहान को बंजर बना दो
नदी नालों को सूखा दो
कायनात को   विकास की भेंट चढ़ा दो
बरगद की जगह दुकाने लगेगीं
आदमी की बनायीं हुई दुनिया
अब आदमी को ही ठगेगी
अब तो चिड़ियाघरों की तरह नुमाइसों में
खुद से निकल कर खुद को  देखते है
माल निचोड़कर सपने फेंकते हैं
खुली आँखों में रंगीन धूल झोंकते हैं
ख़ालिस नयी सड़क बन रही है
हमारे तरफ की गलियाँ बन्द हैं
एक जादू में हम नज़रबन्द हैं
ये  तमाशे किसको कितने फायदेमंद हैं ?
अनिल कुमार शर्मा
29/08/2016



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