Thursday, 25 August 2016

विषमकालीन कविता
मेरे समकालीन कवियों !
अब तो शब्दों  की प्रतीति में
अर्थ बिलकुल विलुप्त हैं
ध्वनि के सामानांतर
एक अजीब सी कोलाहल है
समुद्र मंथन का पसरा हलाहल है
अमृत की तलाश में  विष मिला है
जिससे  समय और सन्दर्भ हिला है
विज्ञानं के भरोसे का  जहर और
अध्यात्म के अखाड़े का कहर
बताओ तो किस पर टूटता है
इसमें किसका दम घुटता है
समकालीन दिशा में विषम हूँ
भाषा के शब्दजाल का वहम हूँ
भीतर की सड़ाध बाहर महकती है
रंग और इत्र पोतकर गमकती है
लिंगप्रबुद्ध आलोचक मदनमय होकर
योनिपूजन के अनुष्ठान गढ़ते है
दरिद्र व्यवस्था में प्रतिष्ठान बनते है
भाषा में  अजीब साहित्यगिरी  करते  है
अब तो कविता से ज्यादा कविताबाज़ी है
 प्रतिष्ठानों  में घुरहू कतवारू पड़े हुए है
सौंदर्यहीन हीरे मोती में जड़े  हुए हैं
इस माहौल में मेरी कविता शरमाती है
दिमाग में घुसकर गरमाती है
समय और सन्दर्भ को गाती है
जो एक आग का खेल है
खाली दिया में तेल है
जिसमे लौ बनकर जलना है
समय के आँच में पिघलना है
ज्ञान से आच्छादित विचित्र तम है
सौन्दर्य के समवाय में विषम है
नूतन प्रकाश ढूँढ़ती सविता है
मित्र यह विषमकालीन कविता है ।
अनिल कुमार शर्मा
25/08/2016












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