Monday, 22 August 2016

अब तो सवालों में ढक गया हूँ
किसी अँधेरी नियति की तरह
ये उजाले की तरह सवाल सारे
किसी घुप अँधेरे में टकराते है
खुद को कहाँ हम पाते है ?
वे तो जबाब की तलाश में
सवालों पर पटक जाते हैं
जो भी जबाब बनता है
उसे  भी गटक जाते हैं
मैं तो स्वर्ग के रास्ते में
त्रिशंकू की तरह लटका हूँ
विश्वामित्र से पाया झटका हूँ
इन्द्र की नीयत में खोट है
दिल में स्वर्ग की चोट है
लगता है नरक का भरोसा है
क्यों भाग्य को इतना कोसा है
ये लोग तो अब जिंदगी छीनते  है
हमें कई गुणांकों में गिनते हैं
उनसे हमारी बिनती है
और हम उनके लिए मात्र गिनती हैं
उलझे सवालों की तरह
ये जबाब भी उलझे हैं
राख़ से  अलाव बुझे हैं
अनिल कुमार शर्मा
२२/०८/२०१६

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