anilkumarsharma

Friday, 25 December 2015

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    किताब की समीक्षा - Samachar4media

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    Oct 5, 2015 - kangal-hota-jantantra. चर्चित कवि अनिल कुमार शर्मा का 'कंगाल होता जनतंत्र' काव्य दो दशकों के आर्थिक,  ...
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    Title: Kangala hota janatantra , Author: Sarma, Anila Kumara (Poet), ISBN: ... अनिल कुमार शर्मा = Kangal hota jantantra / by Anil Kumar Sharma. Edition  ...
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    ANIL KUMAR Sharma - Google+

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    ... Sadar, Ghazipur-233001. - teacher - B.S.A Ghazipur - 233001, India - ups mohamdabad - I have wrote a collection of satiric poem KANGAL HOTA JANTANTRA,
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    Wednesday, 10 December 2014 - anilkumarsharma

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    Dec 10, 2014 - I have wrote a collection of satiric poem KANGAL HOTA JANTANTRA,. View my complete profile. Watermark template. Powered by Blogger.

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    anil sharma | LinkedIn

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    Ghazipur, Uttar Pradesh, India - ‎Teacher at BSA - ‎BSA
    KANGAL HOTA JANTANTRA. VIKALP PRAKASHAN, 2226/B, FIRST FLOOR. STREET NO.-33, PAHLA PUSTA, SONIA BIHAR, DELHI-110094. January 2015.
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    Wednesday, 15 January 2014 - anilkumarsharma

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    Jan 15, 2014 - I have wrote a collection of satiric poem KANGAL HOTA JANTANTRA,. View my complete profile. Watermark template. Powered by Blogger.

    Accn No Title Author P. Year Publisher Place - Academia.edu

    www.academia.edu/.../Accn_No_Title_Author_P._Year_Publisher_Place
    ... ki Azadi Jantantra mein lok sewak Jantantra mein lok sewak Jantantra mein lok...... Sri Lanka (1707-1782) Kangal aur kangali: samajik, Arthik aur rajnetik ayam ....aisa na hota Kash: Dhara 370 lagoo na hoti: dhara 370 par bebak drishtikon  ...

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    Wednesday, 16 December 2015

    किस्सा कटोरे का
    कहो कटोरे
    अब तक कितने विकास बटोरे
    कटोरे में जनता वोट देती है
    कम्पनियाँ नोट देती हैं
    कटोरे की बारी किसको चोट देती है
    दुनिया में कितने तरह के कटोरे है
    और कितने उम्मीद बटोरे है
    कही ग्लोबल है
    तो कही लोकल है
    कहीं फुटकर है तो कही थोक है
    खून चूसता कोई जोंक है
    सामने वाला कटोरा खाली है
    कटोरेवाला जाली है
    कही भरी कोई थाली है
    जिसमे यह कटोरा खाली होता है
    कभी इसका तो कभी उसका पाली होता है
    कटोरा तो वही है बस हाथ दूसरा है
    सिक्का उछलता कोई तीसरा है
    चित भी उसका है पट भी उसका है
    जमीं तो हमारे पैरों तले खिसका है
    लिखने को बहुत था
    पर कागज़ रह गए कोरे
    कहो कटोरे
    अब तक कितने विकास बटोरे
    अनिल कुमार शर्मा
    16/12/2015






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    Saturday, 12 December 2015

    कुछ सबूत में ,कुछ गवाह में
    कुछ वकील की दलील में खो गया
    और न्याय हो गया
    कुछ तथ्य है कुछ कानून है
    कुछ अजीब प्रक्रिया है
    कुछ लिया है कुछ दिया है
    बहुत कुछ किया है
    कितनो को मार कर
    वह आदमी जिया है
    यहाँ न्याय कितना त्वरित है
    सुबह सजा शाम को जमानत रचित है
    संदेह के लाभ  में निर्णय  विरचित है
    यह संदेह क्या है ?
    सफ़ेद चादर पर एक काली बिंदी है
    न अंग्रेजी है न हिंदी है
    न साफ़ है न गन्दी है
    सबूत और गवाह की जुगलबंदी है
    मजबूत जंजीर की एक कमजोर कड़ी है
    जहाँ इशारों में ही निगाहें लड़ी हैं
    लाश पर लेटी  फूलझड़ी है
    जिसपर हीरा मोती जड़ी है
    चांदनी की चमक में संदेह हो गया
    और न्याय हो गया
    अनिल कुमार शर्मा
    12/12/2015


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    Thursday, 10 December 2015

    यह जो है जहाँ है जैसे है
    सवाल यह है, क्यों है? और  कैसे है ?
    मुझे बहुत कुछ याद आता है
    बहुत कुछ भूल जाता है
    बहुत कुछ तर्क से जानता हूँ
    बहुत कुछ विश्वास से पहचानता हूँ
    श्रुति और स्मृति के दर्शन से परे
    प्रश्नांकित संदेह कितने भरे
    मुझे क्यों इतना  विश्वास होता है
    मुझे क्यों फिर  संदेह होता है
    निर्णय के बाद भी क्यों द्वन्द होता है
    कही पराग तो  कही मकरंद होता है
    कुछ काँटों में उलझी जिंदगी
    कुछ काँटों में उलझाती जिंदगी
    पुष्प की इच्छा लिए मर रही है
    व्यवस्था विचित्र न्याय कर रही है
    लगता है  न्यायपालिका में भी निवेश होता है
    इंसाफ का भी  कितना गजब वेश होता है
     मर गया दब कर  फूटपाथ पर जो आदमी
    छूट गया  विमान से दाबकर वो आदमी
    देख लो इस आदमी को मिल कर सब आदमी
    फूटपाथ वाले करते रहो दादामाई
    समरथ के नहीं दोष गोसाईं ।
    अनिल कुमार शर्मा
    10/12/2015







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    Tuesday, 8 December 2015

    इन छले हुए उजालों में
    अब अँधेरे  सैर करते है
    रोशनी लिए ये  चिराग भी 
    क्यों रंगीन अंधेरो से डरते हैं ?
    सपने दिखा कर जो हमसे नींद छीने हैं
    अँधेरों  से निकलने की उम्मीद छीने हैं
    खयाली रोशनी के जो जाल बीने है
    दमकते हुए ये  कितने कमीने हैं
    लगी भूख की जो आग तापते है
    नंगे जिस्म की औकात नापते है
    जमींन छीन कर आसमान मापते है
    धरती का बढ़ता  तापमान बांचते हैं
    डूबते शहर में अपना निशान खांचते हैं
    अब तो घरों में दुकान सजाये हुए है
    ये बेशर्म कितने लजाये हुए हैं
    कितने बिके और बिकाये हुए है
    सिरहाने की ओर अब पैर करते हैं
    इन छले हुए उजालों में
    अब अँधेरे सैर करते हैं ।
    अनिल कुमार शर्मा
    08/12/2015


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    Friday, 4 December 2015

    दारु पीते प्रख्यात कवि को मैंने देखा
    जन की चिंता करते होटल में
    जीभ डुबोये बोतल में
    कुछ क्रान्तिकांक्षी जुटे हुए थे
    बोद्का व्हिस्की लुटे हुए थे
    जाम लड़ाते बुर्जुवा पर टूटे हुए थे
    पिलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
    मयखाना धरा पर कही रह न जाए
    अकाल में सारस मय पीकर गाये
    कविता की धुन में हिचकी आये जाए
    बाघ बुझौनी खूब बुझाए
    अभी बिलकुल अभी यही सुझाये
    यह कविता कितनी बातें ढक रही है
    किसकी ज़मीन कब पक रही है
    यहाँ से देखो जिंदगी थक रही है
    सड़े वसूल में एक पकी ज़मीर है
    मुंशी जी के खोल में कही कबीर है
    हो रही कब्रिस्तान में पंचायत है
    गवाह चुस्त मुद्दई गायब है
    आँखों के आगे कुछ भी हो
    पर नज़र ठहरती बोतल में
    दारू पीते प्रख्यात कवि को मैंने देखा
    जन की चिंता करते होटल में ।
    अनिल कुमार शर्मा
    ०४/१२/२०१५
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    Monday, 16 November 2015

    उसके हाथों में कोई एक कहानी है
    और उसके पास कुछ   बेबस जवानी है
    उसे  कोई फर्क नहीं पड़ता इस ज़माने में
    कितना बिगड़ जाता है कुछ बनाने में
    अब तो आदमी की नस्ल  को आदमी ही खाता है
    जाने किस पेट में पचाता है
    कहीं से कोई बंदूक घूमाता है
    आदमी के हाथ से आदमी को गिराता है
    इस आदमी की बेबसी वह आदमी है
    जिसके कलेजे में आग आँखों में नमी है
    बारूद के टीले पर आशियाना बनाता है
    मौत के साये में जीना सिखाता है
    एक अजीब रास्ता दिखाता है
    जहाँ खून की नदी बहती है
    अब ये लाशें कहती है
    अनिल कुमार शर्मा
    17/11/2015




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    Saturday, 14 November 2015

    मेरे जन्मदिन !
    फिर आ गए उसी तरह
    जैसे बार -बार आते हो
    मुझे समय में चक्र की तरह घुमाते हो
    धुरी और परिधि में कुछ अंक जोड़ जाते हो
    इस संकुचित में कुछ विस्तार मोड़ जाते हो
    मैं तो वही हूँ समय की दूरी में
    जन्म के बाद हर साल बढ़ता हुआ
    आसमान में सूरज की तरह चढ़ता हुआ
    कभी बादलों में ढक जाता हूँ
    समय की ऊंचाइयों में थक जाता हूँ
    तुम्हारे आने से कुछ नयापन लगता है
    बुढ़ाते समय को जैसे बचपन ठगता है
    इस ठगे हुए समय में जी रहा हूँ
    मित्र ! तुम्हारी शुभकामना पी रहा हूँ
    इस देश ,काल के हम पात्र है
    समय में बंधे हुए समय के छात्र हैं
    जिसे अपनी नज़रों से पढ़ते हैं
    इसे कई सांचों में गढ़ते हैं
    जो ठोस होकर पिघल जाता हैं
    पिघला हुआ भी ठोस हो जाता है
    समय के इस आगोश में
    किसका समय कहाँ खो जाता है
    समय की निरंतर शिला  पर तुम
    समय की धार की तरह टकराते हो
    मेरे जन्मदिन ! फिर आ गए
    उसी तरह जैसे बार -बार आते हो ।
    अनिल कुमार शर्मा
    १४/११/२०१५
    ४३ वां जन्मदिन


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    Friday, 6 November 2015

    मेरे मित्र तुम क्या -क्या खाते  हो
    और क्या क्या पचाते हो
    कुछ तो पच जाता होगा
    कुछ बिना पचे बच जाता होगा
    तुम्हारे आहारनाल में
    धर्मों के खाद्य अखाद्य पचकर
    क्या आत्मा तक पहुँच जाते है ?
    गढ़े हुए परमात्मा को खुजलाते है ?
    लोग इतना क्यों झुंझलाते है
    थाली में बवाल मचाते है
    भोजन , भजन और भाजन
    चय में उपचय और पाचन
    आहार- विहार में संहार
    और वसुधैव कुटुम्बकम का संस्कार
    सीना ठोंककर गाते है
    मनुष्य से गिरकर मवेशी तक आते है
    और नायं हन्ति न हन्यते बताते है
    एक खास पशु की प्रतीति में
    इंसान को मारते है काटते है
    अंहिंसा परमोधर्मः बाँचते है
    एक विचित्र विश्वास लादते है
    धर्मपाश का सत्ता संधान
    जिसमे भोजन और स्नान
    बन जाता शास्त्र ज्ञान
    जिसे लोक पर लादते रहो
    और अपनी पोथी बाँचते रहो ।
    अनिल कुमार शर्मा
    06/11/2015

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    Wednesday, 4 November 2015

    कुछ पुरस्कार लौटा रहे हैं
    तो कुछ तिरस्कार लौटा रहे हैं
    लो हम सारा सरोकार लौटा रहे  हैं
    इस ज़मीन के मूल्यों से हट कर
    उनकी गढ़ी हुई कोई ज़मीन है
    जिस पर पौधे जमने से कतराते है
    वे लोग तो गमलों में कुछ ज़मीन लगाते हैं
    छुरी कैंची उनके पास है
    काट- छांट में विश्वास है
    कहते है समाज सबका है
    किन्तु तरीका तो उनका है
    कुछ निरा बुद्धिभक्षी हैं
    कुछ छद्म बुद्धिरक्षी है
    स्वयं को कहते बुद्धिजीवी हैं
    इनमें अधिकतर तो गोष्ठीजीवी हैं
    पहचान के लिए परेशान है
    ये विचित्र इंसान है
    खाली डिब्बे से घूरों पर पड़े है
    रद्दी किताबों की तरह
    किसी गोदाम में सड़े हैं
    किसी ऊबन की तरह महक रहे हैं
    बिना रास्ते के ज्यादा बहक रहे हैं
    लगता है पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
    उनके गमलों की मिटटी सिसक रही है
    नए पौधे जमने से कतराते हैं
    पुरुषार्थहीन छटपटाते हैं
    बन्दर की तरह कटकटाते है
    इस डाल से कूदकर
    उस डाल पर जाते हैं
    फिर उसी डाल पर वापस आते हैं
     विचित्र इनके रिस्ते हैं
    गज़ब इनके नाते हैं
    एक बात को उगल कर
    पुनः उसी बात को खाते हैं ।
    अनिल कुमार शर्मा
    04/11/2015

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    Tuesday, 3 November 2015

    किस बंधन में बँधा प्रिये
    सुरभित सरस  डोरे से
    कुञ्चित कच उर्मिल उर पर
    स्पंदित मंद हिलोरे से
    व्याकुल कर देती स्मित मंद
    तेरी अधरों के कोने से
    मंजु मनोहर  भाल प्रभा
    आशिष कृष्ण के बाल सखा
    यमुना तट के  कदम्ब कुञ्ज में
    कुसुमित सुमन पर भ्रमर गूँज में
    अन्तस्तल में मधुर राग बजाती हो
    सुभग अनुराग जगाती  हो
     मधुपुरित ये नयन खुले
    प्रिय मेरे मन के राह भूले
    भंवरजाल इन केशों में 
    मंद नयन उन्मेषों में
    कितनी मादक  लगती हो
    माया वन में खिली कुसुम सी
    मुझ  भौंरे   को ठगती हो
    ऊर्ध्वाधर प्रेम शिखर सी
    कितनी विह्वल लगती हो |
    अनिल कुमार शर्मा
    03/11/2015



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    Sunday, 1 November 2015

    मुख मयंक को मैंने देखा
    प्रिय! अपनी मधु चक्षु कोटर से
    श्याम मेघ में तड़ित सी
    कोमल पलकों का खुलना था
    स्मित अधरों पर मुक्तावली सी
    चटक पंखुरियों में खिलना था
    मोहक मन की मधु स्मृतियाँ
    सरसिज उर पर खिली हुई
    पुष्ट प्रेम की मंडप सी
    उच्छ्वासों में तनी हुई
    अमृतमय घट द्व्य
    प्रेम पूरित तन्मय
    नीहारिका  सी रजनी में
    पुष्पवास सी मोहक हो
    रजनीगंधा सी महमह करती
    प्रिये! कितनी सम्मोहक हो ।
    अनिल कुमार शर्मा
    ०१/११ २०१५ 
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    Saturday, 24 October 2015

    मेरा भारत इतिहास में अपवाद है
    पहले भी जातिवाद था
    आज भी जातिवाद है
    पहले ब्राह्मणवाद था
    अब दलितवाद है
    अगड़ा और पिछड़ा है
    एक विचित्र झगड़ा है
    अल्पसंख्यक में बहुसंख्यक
    और बहुसंख्यक में अल्पसंख्यक
    शीरे में जलेबी की तरह गड़ा है
    कड़ाही और छनौटा पड़ा है
    भट्ठी सुलग रही है
    कोई नयी आग लग रही है
    हवा भी ठग रही है
    आदमी से औवल  जात है
    संवैधानिक करामात है
    जाति ही जीती है
    जाति  ही मरती है
    जिसमे राजनीति  चरती है
    अब इंसानियत डरती है
    अब यहाँ बंजर है और परती है
    अनिल कुमार शर्मा
    24/10/2015

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    Wednesday, 14 October 2015

    इस समय की खड़खड़ाहट  में
    इतना खड़खड़ा रहा हूँ
    ज़मीन पर फड़फड़ा रहा हूँ
    कुछ ज़मीनें छूट गयी हैं 
    कुछ अभी बिलकुल नयी हैं
    पथराये हुए  पांव मेरे
    ठूँठ  के ये छाँव घेरे
    घोसले जो थे उजड़ गए
    नीड़ के   लाले पड़ गए
    समय से कटकर भी
    जो जिंदगी बच गयी  थी
    अब लूटी उम्मीदों में
    घुट घुट कर मर रही है
    अप्रत्याशित भय से डर  रही है
    अब तो सपने भी डराते हैं
    वो लोग ऐसा क्यों कराते हैं
    सुकून देती इस इमारत को
    किस वजह से गिराते हैं
    अब राह चलते भी
    पैर क्यों इतने लड़खड़ाते है
    जंगलों  में शहर और शहर में जंगल
    उजड़े  गांव से तडफ़ड़ाते हैं
    अनिल कुमार शर्मा
    14/10/2015




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    Tuesday, 22 September 2015

    कुछ छिपे हुए शब्द
    और कुछ छिपे हुए रिश्ते
    निकल  आते है कभी -कभी
    अजनबी चेहरों में भी
    अपने धड़कते दिलों की तरह
    अजीज लगने लगते है ये  लोग
    खुद के रिश्तों से बढ़कर
    कुछ तार ऐसे जुड़ जाते है
    बिना किसी उम्मीद के
    बेचैन हो जाता हूँ
    क्यों और किसलिए नहीं जनता
    रिश्तों की गहराइयों को
    सिर्फ डूबने के सिवा ।
    अनिल कुमार शर्मा
    22/09/2015
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    Thursday, 17 September 2015

    दिवस की  इस हिंदी में
    पुरस्कृत हिंदी और तिरस्कृत हिंदी
    दोनों अजीब तरह से  परेशान है
    किसी का सम्मान है तो  किसी का अपमान है
    किसी के लिए सिर्फ  दारू और जलपान है
    हिंदी लिखी जाती है पढ़ी जाती है
    असल में यह गढ़ी जाती है
    कई फ्रेमों में मढ़ी जाती है
    जनता की हिंदी और हिन्दीवाले की हिंदी
    में एक अजीब सा अंतर है
    पुरस्कृत और तिरस्कृत निरंतर है
    इसमें पहली और दूसरी परम्परा है
    कही विरान  है तो कही हरा भरा है
    कोई खुश तो कोई जरा -मरा है
    कहते है हिंदी में एक जूता है
     जो उसे  चाटता है
    पुरस्कार काटता है
    अब तो हिंदी मनाई जाती है
    जैसे कई बच्चों की माँ हर साल
    दुल्हन बनायीं जाती है
    हिंदी तुम्हारी यही छवि है
    कविता से ज्यादा परेशान कवि है ।
    अनिल कुमार शर्मा
    17/09/2015




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    Wednesday, 16 September 2015

    चलो शुरू करते है
    अब यही से जिंदगी
    जीतनी बच गयी है
    अपने हाथों में
    बहुत कुछ छूट गया होगा
    बहुत कुछ लूट गया होगा
    अपने अरमानों की थाती संजोये
    वो आदमी टूट गया होगा
    अब तक जो घुटन थी
    दिल की जो टूटन थी
    डाल  से टूटे फलों की तरह
    बिखरकर फिर से जमना होगा
    उजड़े चमन में फिर से बनना होगा
    मैं टूट चूका हूँ इस कदर
    अपनी पुरानी ख्वाहिशों में
    अब नज़र के दायरे बंद हो गए है इतने 
    नयी ज़मीनें नज़र में नहीं आतीं
    बची हुई जिंदगी शून्य में छटपटाती
    इस निहायत शून्य को भरना होगा
    अब खुद  में संवरना होगा ।
    अनिल कुमार शर्मा
    17/09/2015

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    Friday, 11 September 2015

    वही उदास चेहरों के
    अब  उदास सवाल
    खिले चेहरों पर
    कुछ ज्यादा   खिलने लगे है
    हानि -लाभ फिर से मिलने लगे है
    सबके काले चिट्ठे तो
    अब एकदम सफ़ेद है
    सिर्फ हमारे और उनके में भेद है
    लाभ तो सदा  उनका है
    सिर्फ घाटा हमारा है
    ठिठुरते हुए माहौल में
    चढ़ता हुआ पारा है
    एक कशिश थी दोस्त !
    हमारे और तुम्हारे दिलों में
    सबका कल एकदिन बेहतर होगा
    वह आने वाला कल
    किसी अँधेरे खोह में खो गया
    लगता है जो होना था हो गया
    फिर भी कहीं न कहीं
    एक  टींस जिन्दा है
    जिसमे उम्मीद का
    एक फड़फड़ाता परिंदा है
    मेरे दोस्त यही एक उम्मीद है
    जो किसी तरह जिन्दा है
    अनिल कुमार शर्मा
    12/09/2015

    Posted by anilkumarsharma at 19:46 No comments:
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    Friday, 21 August 2015

    यह दुनिया है
    और दोस्त इस दुनिया में दुःख है
    सवाल यह है कि
     इस दुःख को कैसे काटा  जाये
    इसे किस तरह बांटा जाये
    जीवन के सन्दर्भ में इच्छाएं जीती हैं
    तथागत !यह  मोक्ष भी एक इच्छा है
    जीवन के आयाम की बृहत्तर इच्छा
    इन सब दुखों से पार जाने का दुःख
    कितना आनंद देता है
    जीवन का अतिक्रमण
    काल कुंचित देह से हटकर
    विदेह की परिणति में
    एक सजग निर्लिप्त प्रवाह
    मोहता है मोह को
    आत्मविवेचना के परे
    वही है दुःख
    अनंत सुखों को समेटे हुए
    आशा तृष्णा से दूर
    विशुद्ध आत्मा में
    स्वयं परमात्मा में ।
    अनिल कुमार शर्मा
    21/08/2015

    Posted by anilkumarsharma at 07:58 No comments:
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    Sunday, 2 August 2015

    मेरे दोस्त जो दुश्मन बन गए हो
    आओ फिर से वही दोस्ती निभाओ
    और सदा के दुश्मनो तुम भी
    अपनी दुश्मनी दोस्ती में भुलाओ
    चन्द लम्हे जो कंटीले रह गए
    उनको भी गमकते से फूल बनाओ
    कहीं तो क्लेश होता है
    इन  टूटे दिलों के कोने में
    जीतनी ख़ुशी होती है पाने में
    उससे ज्यादा गम होता है खोने में
    एक एक लम्हा गुजर जाता संजोने में
    यह तो महज़ एक चुभती सी टीस है
    जिसे मैंने पा कर खो दिया
    दोस्त तेरी दुश्मनी पर रो दिया
    अनिल कुमार शर्मा
    ०२/०८/२०१५
    Posted by anilkumarsharma at 03:38 No comments:
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    Friday, 31 July 2015

    एक ज़माने की हिंदी में
    प्रेमचंद होते थे
    अब की हिंदी में
    चंद प्रेम होते है
    जो खेमेबंदी में खोते है
    असली प्रेमचंद
    नकली प्रेमचंद वालों में रोते हैं
    अब तो प्रेमचंद कई चादरों में ढके है
    जिनके कोने कोने भी फटे है
    लेकिन एक बात जरूर है
    प्रेमचंद को कोई कितना भी  ढके
    वो मेरी ओर झांकते जरूर हैं
    जब कभी भी मैं अकड़ता हूँ
    प्रेमचंद तोड़ते मेरा गरूर हैं
    जमाना तेज है चाल मंद है
    थके हुए प्रेमचंद है
    अनिल कुमार शर्मा
    ३१/०७/२०१५
    जन्मतिथी पर याद करते हुए


    Posted by anilkumarsharma at 04:56 No comments:
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    Wednesday, 22 July 2015

    There is something with me and you
    Sad smiles of soaring dust and dew
    But I love and you love too
    Clouds are high storm is still
    I sense you with your full blooming
    Fragrance of nectar brooding everywhere
    Your rose like lip and pearl like teeth
    And your particular secret beauty
    Most beautiful of all your beauty
    My arousal is high sense impaired
    I express my  love undeclared
    I thrust my me in your you
    Thus my lovely I'm your beau
    Sad smiles of soaring dust and dew.
    Anil Kumar Sharma
    22/07/2015







    Posted by anilkumarsharma at 05:47 No comments:
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    Tuesday, 14 July 2015

    मेरे दोस्त दुःख तो वही है
    जो कई चेहरों पर चिपक जाता है
    अज्ञात सुख के आगोश में
    हमें भी और तुम्हे भी भरमाता है
    यह रोशनी कुछ दूर बाद
    फिर उसी अँधेरे में मिल जाती है
    एक जिंदगी में जीते हुए
    कितनी जिंदगियां छटपटाती है
    मैं खुद से निकलता हूँ
    तुम्हारे इर्द -गिर्द पाता  हूँ
    उसी रोशनी के लिए छटपटा हूँ
    जिसकी नियत फिर से
    उसी अँधेरे में मिल जानी है
    दोस्त ये जिंदगियां
    आनी है और जानी हैं ।
    अनिल कुमार शर्मा
    १५/०७/२०१५


    Posted by anilkumarsharma at 17:40 No comments:
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    Sunday, 21 June 2015

    ठगयोग अन्धकारिका 
    यम नियम को गोली मारो
    नहीँ नेति ,धौति ,वस्ति है
    सत्ताभोगियों की यौगिक मस्ती है
    सत्तासन से सिंघासन तक
    घोटालासन से भ्रष्ट -आसन तक
    वातानुकूलित कमरो में भ्रष्ट-अयाम करते हैं
    सम्भोग से समाधि तक पढ़ते है
    सम्भोग से ब्याधि में मरते है
    चमचासन से नेतासन तक
    दरिद्रमुद्रा से धनासन तक
    धोखासन और ठगासन
    जनता तुम्हें सिर्फ शवासन है
    भ्रष्टभाँति भ्रष्टलोम विलोम
    ठगबंधक्रिया ठगात्मक आचार 
    विलासी जीवन नीच विचार
    सत्तासुख के मधुरस भोगी हैं
    योगी नहीं सब ठगयोगी हैं
    अनिल कुमार शर्मा
    २१/०६/२०१५

    Posted by anilkumarsharma at 05:39 No comments:
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    Thursday, 18 June 2015

    I love you like  fresh morning breeze
    Like gentle dew in the blooming bud
    I intrude in  all the petals open
    Suck the nectar like a hummingbird
    Flowers and thorns of gloomy life
    Enlighten me to proceed infinite
    Where I suffer in nascent void
    In this pathless tramps of vices
    In the heap of desire and wishes
    I love thee like arising sun of dawn
    I hide you in the moon light night
    In utter silence of dead night
    I hear your speaking eyes
    Curl of hair cheeks so fair
    Pearls inside rosy lips
    I blow in your nose respire
    What is this cold fire?

    Anil Kumar Sharma
    19/06/2015





    Posted by anilkumarsharma at 12:04 No comments:
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    Tuesday, 16 June 2015

    मेरी सुखी दिल्ली में
    एक दुखी आदमी रहता है
    वह आदमी के दुखों से दुखी है
    थोड़ा बहुत जनतामुखी है
    सत्ता उखाड़ू है
    हाथ में झाड़ू है
    कूड़े के ढेर पर
    कुर्सी के मुंडेर पर
    बन्दर की तरह उछलता है
    बच्चे की तरह मचलता है
    भ्रटाचार से हमें फुसलाया है
    खुद उसी में समाया है
    दूसरे की गिरेबान में झांकता है
    अपना देखने में काँखता है
    कोई सुराख़ ढांकता है
    बहुत टोकता है
    आँख में धूल झोंकता है
    विचित्र पैगाम है
    आदमी आम है
    अनिल कुमार शर्मा
    १७ / ०६ २०१५

    Posted by anilkumarsharma at 21:01 No comments:
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    Thursday, 11 June 2015

    One day it is more to live
    Or one day it is more to die
    I have such a life
    On edge of sharp knife
    My muscles are frowning
    My blood is boiling
    I want to proceed in void
    All my treasure devoid 
    Such and such
    More and much
    I go in fancy
    Of libido and nancy
    I dig the tradition
    Break the decision 
    Come to profit and loss
    We forever argue the toss
    More I doubt less I believe 
    One day it is more to live
    Anil Kumar Sharma
    12/06/2015

    Posted by anilkumarsharma at 18:17 No comments:
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    Saturday, 6 June 2015

    कुछ तो है
    यहाँ से दूर
    सपनों में तो क्या
    जिंदगी की खाक छानने से
    अच्छा तो है सपनों में जी लेना
    कुछ अमृत उम्मीदों की पी लेना
    इस समुन्द्र मंथन का विष कौन पियेगा
    महादेव की जिंदगी कौन जियेगा
    सुर और असुर के बीच फंसा आदमी
    ज़हर बोते हुए अमृत तलाश रहा है
    खेतों की कीमत पर
    निवेश रत्न तराश रहा है
    क्योंकि ज़मीन पर सपने नहीं होते
    आसमान के घर भी अपने नहीं होते
    यह कैसा स्वप्नदाह है
    ह्रदय से निकलता आह है
    अनिल कुमार शर्मा
    ०७/०६ / २०१५
    Posted by anilkumarsharma at 21:29 No comments:
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    Tuesday, 2 June 2015

    उसके चेहरे पर
    एक हँसता हुआ दुःख
    बार- बार उभरकर  आता है
    दुःख का चेहरा भी
    उस चेहरे को देखकर शर्माता है
    अब तो लतीफाशाही की कद्र है
    और उसे फ़िक्र हमारी है
    क्योंकि हमें अपनी फ़िक्र नहीं आती
    जिंदगी मौत को पिघलाती
    आंकड़ों के अक्स दिखाती
    कुछ अजीब नींद में सुलाती
    ज़मीं से हटकर स्वप्न दिखाती
    अब तो दर्द भी बिकने लगे है
    बाजार में अजीब ख़रीददार दिखने लगे है
    पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
    किसी के हिस्से की जिंदगी सिसक रही है
    वह तो एक  अजीब दुनिया में भरमाता है
    उसके चेहरे पर
    एक हँसता हुआ दुःख
    बार -बार उभरकर आता है
    अनिल कुमार शर्मा
    02 /06 /2015


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    Saturday, 16 May 2015

    Once upon a time
    I saw an intellectual
    Merged in heaps of books
    Slept on tattered notebooks
    Unsatisfied with all he had
    Cutting with sharp knife of logic
    Unending stream of arguments
    Once that was good turned bad
    And this bad should be better
    Wrong ought to be corrected
    And this correction should
    Be further corrected
    This is nothing but
    Unending corrections of corrections
    Without love and affection
    Pure reason of character dual
    Once upon a time
    I saw an intellectual.
    Anil Kumar Sharma
    17/05/2015
    Posted by anilkumarsharma at 21:25 No comments:
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    Saturday, 9 May 2015

    Motel justice
    Our courts are like five star hotels
    Open for everyone
    But who have purse
    Access into it
    And purchase the justice
    As per their choice
    This is open and suppressed voice
    Failed state and jumbled procedure
    Walk together birds of the same feather
    Lawful lawlessness
    Accused and witness
    This is rule of Law
    Mingle with utter flaw
    Friends and enemies
    Purse that cost a pretty penny
    It is all on sale
    Whether  gallows or gale.
    Anil Kumar Sharma
    09/05/2015



    Posted by anilkumarsharma at 06:54 No comments:
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    Thursday, 7 May 2015

     बहस में है दुःख
    और बहस में है सुख भी
    अब उम्मीद भी बहस में है
    करवटें किधर से किधर बदलती हैं
    बदलती बहस भी बहस में है
    सिर्फ मेरा दुख और
    तुम्हारा दुःख अपना है
    उम्मीदों पर बसा सुख
    मात्र एक सपना है
    बहस के कारीगर
    अब सपने  छीन रहे हैं
    हम दुःखी लोग
    दुःख के ज्वालामुखी में
    सिर्फ अपना दुःख
    गिन रहे हैं
    अनिल कुमार शर्मा
    08 /05 /2015
    Posted by anilkumarsharma at 20:23 No comments:
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    Tuesday, 28 April 2015

    इस दुःख के बाद
    और क्या दुःख होगा
    नष्ट जिंदगी की ये तस्वीरें
    जहाँ जीवन एक वीरान  है
    घोसले  उजड़ गये
    परिंदे हलकान हैं
    जमीन वही है
    बसेरा ढह गया
    दर्द की कहानी
    कोई  कहर कह गया
    दिन की दहसत
    सारी रात बढ़ती है
    दुःख की बादल
    आसमान चढ़ती है
    प्रभु ये कैसी लीला है
    कंगाली में आटा गीला है
    अनिल कुमार शर्मा
    28 /04 /2015


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    Tuesday, 24 February 2015

    अपने आदमी की  शक्ल के भीतर
    ढूंढता हूँ उस आदमी के रूह को
    जिसमे संक्रमण का दौर है
    आत्मा और परमात्मा के बीच का आदमी
    क्यों अपनी आदमियत खो दिया
    तमाम धर्मो का अमरबेल बो दिया
    जो  आदमी के रस को चूसकर
    हरा भरा स्वरुप पाया है
    खोखले आदमी के ऊपर छाया है
     क्या यही परम  पुरुष की माया है ?
    अनिल कुमार शर्मा
    25/02/2015
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    Monday, 23 February 2015

    किस दुःख को याद करू
    किस सुख की बात करू
    जीवन के झंझावातों में
    कैसे कैसे जज्बात भरु
    कोमल बचपन का उषाकाल
    खिले यौवन की वह दोपहरी
    सुरभित मधुमय  संवेगों में
    स्वप्निल पल अभिसार भरी
    घट है यह जीवन का
    या जीवन का घट घट
    कंटकाकीर्ण यथार्थ पगों में
    बद्ध नित्य का खट पट
    कुछ मूल्य संजोये बैठा हूँ
    खुद में खुद से ऐंठा हूँ
    अंदर में अति आहत हूँ
    संवेगों में गहरा पैठा हूँ
    जीवन के इस रिक्त पात्र में
    कैसे अवसाद भरे आह्लाद भरु
    किस दुःख को याद करू
    किस सुख की बात करू ।
    अनिल कुमार शर्मा
    24/02/2015
    Posted by anilkumarsharma at 20:24 No comments:
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    Tuesday, 17 February 2015

    कुछ लकीरें खिंच गयी है हाथ में
    कुछ लकीरें मिट गयी है हाथ से
    भाग्य   अपना जो भी था
    आज क्यों पराया हो गया
    खुद के सपनों का महल
    किस गह्वर में खो गया
    हरे भरे बाग़ में भी 
    आशियाने क्यों बिरान  है
    हर कदम पर ठोकरें ही ठोकरें
    आज इंसान क्यों हैरान है
    जो पता देती थी बहारों की
    वो हवाएँ किधर बह गयीं
    नदी के सूखे किनारों पर
    डूबती कश्ती कहानी कह गयी
    सपनों में सींची हुई कली
    फूल बनने से पूर्व ही बह गयी ।
    अनिल कुमार शर्मा
    १८/०२/२०१५



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    Monday, 16 February 2015

    हे शिव आपने
    अपनी नगरी में आये
    याचक भस्मासुर को
    पुनः  वही वरदान दे दिया
    सत्ता मोहिनी के प्रेम में
    वह  प्रफुल्लित  नाच रहा है
     जगह जगह वही वरदान बाच रहा है
    हे शिव आप तो अवढरदानी  है
    स्वयं ही  आग है पानी है 
    जगत  की रवानी है
    मोहिनी के नृत्य का
    कब पूरा रस्म होगा
    यह भस्मासुर
    कब भस्म होगा ।
    अनिल कुमार शर्मा
    शुभ शिवरात्रि
    17/02/2015

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    Wednesday, 4 February 2015

    इन जिंदगी भरे कतारों में
    मैं भी एक कतार हूँ
    जहाँ प्रारम्भ में भी कुछ था
    और अंत में भी कुछ रहेगा
    आदमी अपनी भाषा में सदैव कहेगा
    ज़मीन में धंस कर भी
    जीवाश्म होने की प्रतीति तक
    संवेदनाएं पुष्ट है
    जिंदगी जिंदगी से रुष्ट है
    कुछ उदार तो कुछ दुष्ट है
    ऊषा के प्रारम्भ से
    दिवस के आलोक के पश्चात
    संध्या के अवसान पर्यन्त निशा की
    स्तब्द्ध प्रतीति की संवेदनाएं
    सतत प्रवाह के गह्वर में
    क्यों इतनी अनुत्तरित हैं
    भाषा की सृष्टि में
    मनुष्य का श्रुति बन जाना
    चेतनामय प्रवाह का एक उत्तर है
    प्रकृति चक्र की धारा से इतर
    आलोड़ित अंतस्तल के भीतर है
    वह मनुष्य ही है
    जो बाहर भी चलता है
    और भीतर भी चलता है
    स्वयं की अग्नि में पिघलता है
    स्वभाव का अतिक्रमण कर
    सार्वभौम बनकर चलता है
    काल के कारखाने में
    समय के साँचे में
    इतिहास बन कर ढलता है ।
    अनिल कुमार शर्मा
    ०५/०२/२०१५
    Posted by anilkumarsharma at 22:21 No comments:
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    Sunday, 1 February 2015

    Small and big
    Listen my colleague
    Something descend from the heaven
    And something ascend from the earth
    But it is always in dire dearth
    Our dream and desire
    Add fuel to the fire
    This is a nice pyre
    Burden of life and tire
    Love for hate and hate for love
    And a void treasure trove
    A beauty is not always beautiful
    Values and morals are narrow tools
    I love this beyond all aesthetics 
    My concrete and abstract
    Somebody attract and admire
    Somebody do not care a fig
    Listen me my colleague
    Small and big
    Anil Kumar Sharma
    01/02/2015






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    Saturday, 31 January 2015

    मेरे भ्रष्टकेतु
    तुम्हारे अलग -अलग हेतु
    लक्ष्मी बसना सत्ता रसना
    आस्तीन के साँप की तरह
    रह -रह कर डँसना
    पक्ष में बसना
    और विपक्ष में भी बसना
    तुम तो एक अलग वर्ग हो
    उसी में प्रत्यय और उपसर्ग हो
    मेरी बात मेरी हलक से निकाल कर
    मेरे विस्तार में कहते हो
    फिर भी उसी खूँटे में बंधे रहते हो
    नरम -नरम घास चरते हो
    एक विचित्र संविधान पढ़ते हो
    मेरे जनतंत्र के हेतु हो
    धन्य भ्रष्टकेतु हो !
    अनिल कुमार शर्मा
     ०१/०२/२०१५
    Posted by anilkumarsharma at 20:37 No comments:
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    A global hungry and
    A local hungry
    Meet across the globe
    With abdomen of different sizes
    Of power and prospect
    Of final and nascent
    Need each other
    To cheat each other
    Of overlapping desire
    Some water and some fire
    With dealing attire
    Cleaning mud with mire.
    Anil kumar Sharma
    31/01/2015


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    Saturday, 10 January 2015

    मैं  वही जगह हूँ
    जहाँ से तुम जिंदगी की तरह चली गयी
    क्योंकि जिंदगी तो  आती-जाती है
    जगह अपनी जगह पर रह जाती है
    बुनियाद  बन कर पछताती है
    यही परम्परा  बतियाती है
    किसी उम्मीद में मुरझाती है
    समय की नदी में बह जाती है
    वही बात फिर यहाँ से होकर
    कितनी कितनी दूर निकल जाती है
    इसी जगह पर जिंदगी
    कही दूर से मुस्कराती है
    पुराने ज़ज़्बात में फिर कही से
    कोई नयी बात आती है
    और कितने फूल खिलते है
    कितनी तितलिया मँडराती है
    जगह की साँस में चलती हवाएँ
    ज़िन्दगी की गीत गाती है
    कुछ उम्मीद सजाती है
    यही युगों की थाती है
    अनिल कुमार शर्मा
    10/01/2015

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