Friday, 11 September 2015

वही उदास चेहरों के
अब  उदास सवाल
खिले चेहरों पर
कुछ ज्यादा   खिलने लगे है
हानि -लाभ फिर से मिलने लगे है
सबके काले चिट्ठे तो
अब एकदम सफ़ेद है
सिर्फ हमारे और उनके में भेद है
लाभ तो सदा  उनका है
सिर्फ घाटा हमारा है
ठिठुरते हुए माहौल में
चढ़ता हुआ पारा है
एक कशिश थी दोस्त !
हमारे और तुम्हारे दिलों में
सबका कल एकदिन बेहतर होगा
वह आने वाला कल
किसी अँधेरे खोह में खो गया
लगता है जो होना था हो गया
फिर भी कहीं न कहीं
एक  टींस जिन्दा है
जिसमे उम्मीद का
एक फड़फड़ाता परिंदा है
मेरे दोस्त यही एक उम्मीद है
जो किसी तरह जिन्दा है
अनिल कुमार शर्मा
12/09/2015

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