चलो शुरू करते है
अब यही से जिंदगी
जीतनी बच गयी है
अपने हाथों में
बहुत कुछ छूट गया होगा
बहुत कुछ लूट गया होगा
अपने अरमानों की थाती संजोये
वो आदमी टूट गया होगा
अब तक जो घुटन थी
दिल की जो टूटन थी
डाल से टूटे फलों की तरह
बिखरकर फिर से जमना होगा
उजड़े चमन में फिर से बनना होगा
मैं टूट चूका हूँ इस कदर
अपनी पुरानी ख्वाहिशों में
अब नज़र के दायरे बंद हो गए है इतने
नयी ज़मीनें नज़र में नहीं आतीं
बची हुई जिंदगी शून्य में छटपटाती
इस निहायत शून्य को भरना होगा
अब खुद में संवरना होगा ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015
अब यही से जिंदगी
जीतनी बच गयी है
अपने हाथों में
बहुत कुछ छूट गया होगा
बहुत कुछ लूट गया होगा
अपने अरमानों की थाती संजोये
वो आदमी टूट गया होगा
अब तक जो घुटन थी
दिल की जो टूटन थी
डाल से टूटे फलों की तरह
बिखरकर फिर से जमना होगा
उजड़े चमन में फिर से बनना होगा
मैं टूट चूका हूँ इस कदर
अपनी पुरानी ख्वाहिशों में
अब नज़र के दायरे बंद हो गए है इतने
नयी ज़मीनें नज़र में नहीं आतीं
बची हुई जिंदगी शून्य में छटपटाती
इस निहायत शून्य को भरना होगा
अब खुद में संवरना होगा ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015
No comments:
Post a Comment