Wednesday, 16 September 2015

चलो शुरू करते है
अब यही से जिंदगी
जीतनी बच गयी है
अपने हाथों में
बहुत कुछ छूट गया होगा
बहुत कुछ लूट गया होगा
अपने अरमानों की थाती संजोये
वो आदमी टूट गया होगा
अब तक जो घुटन थी
दिल की जो टूटन थी
डाल  से टूटे फलों की तरह
बिखरकर फिर से जमना होगा
उजड़े चमन में फिर से बनना होगा
मैं टूट चूका हूँ इस कदर
अपनी पुरानी ख्वाहिशों में
अब नज़र के दायरे बंद हो गए है इतने 
नयी ज़मीनें नज़र में नहीं आतीं
बची हुई जिंदगी शून्य में छटपटाती
इस निहायत शून्य को भरना होगा
अब खुद  में संवरना होगा ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015

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