Thursday, 17 September 2015

दिवस की  इस हिंदी में
पुरस्कृत हिंदी और तिरस्कृत हिंदी
दोनों अजीब तरह से  परेशान है
किसी का सम्मान है तो  किसी का अपमान है
किसी के लिए सिर्फ  दारू और जलपान है
हिंदी लिखी जाती है पढ़ी जाती है
असल में यह गढ़ी जाती है
कई फ्रेमों में मढ़ी जाती है
जनता की हिंदी और हिन्दीवाले की हिंदी
में एक अजीब सा अंतर है
पुरस्कृत और तिरस्कृत निरंतर है
इसमें पहली और दूसरी परम्परा है
कही विरान  है तो कही हरा भरा है
कोई खुश तो कोई जरा -मरा है
कहते है हिंदी में एक जूता है
 जो उसे  चाटता है
पुरस्कार काटता है
अब तो हिंदी मनाई जाती है
जैसे कई बच्चों की माँ हर साल
दुल्हन बनायीं जाती है
हिंदी तुम्हारी यही छवि है
कविता से ज्यादा परेशान कवि है ।
अनिल कुमार शर्मा
17/09/2015




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