मेरी सुखी दिल्ली में
एक दुखी आदमी रहता है
वह आदमी के दुखों से दुखी है
थोड़ा बहुत जनतामुखी है
सत्ता उखाड़ू है
हाथ में झाड़ू है
कूड़े के ढेर पर
कुर्सी के मुंडेर पर
बन्दर की तरह उछलता है
बच्चे की तरह मचलता है
भ्रटाचार से हमें फुसलाया है
खुद उसी में समाया है
दूसरे की गिरेबान में झांकता है
अपना देखने में काँखता है
कोई सुराख़ ढांकता है
बहुत टोकता है
आँख में धूल झोंकता है
विचित्र पैगाम है
आदमी आम है
अनिल कुमार शर्मा
१७ / ०६ २०१५
एक दुखी आदमी रहता है
वह आदमी के दुखों से दुखी है
थोड़ा बहुत जनतामुखी है
सत्ता उखाड़ू है
हाथ में झाड़ू है
कूड़े के ढेर पर
कुर्सी के मुंडेर पर
बन्दर की तरह उछलता है
बच्चे की तरह मचलता है
भ्रटाचार से हमें फुसलाया है
खुद उसी में समाया है
दूसरे की गिरेबान में झांकता है
अपना देखने में काँखता है
कोई सुराख़ ढांकता है
बहुत टोकता है
आँख में धूल झोंकता है
विचित्र पैगाम है
आदमी आम है
अनिल कुमार शर्मा
१७ / ०६ २०१५
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