Tuesday, 16 June 2015

मेरी सुखी दिल्ली में
एक दुखी आदमी रहता है
वह आदमी के दुखों से दुखी है
थोड़ा बहुत जनतामुखी है
सत्ता उखाड़ू है
हाथ में झाड़ू है
कूड़े के ढेर पर
कुर्सी के मुंडेर पर
बन्दर की तरह उछलता है
बच्चे की तरह मचलता है
भ्रटाचार से हमें फुसलाया है
खुद उसी में समाया है
दूसरे की गिरेबान में झांकता है
अपना देखने में काँखता है
कोई सुराख़ ढांकता है
बहुत टोकता है
आँख में धूल झोंकता है
विचित्र पैगाम है
आदमी आम है
अनिल कुमार शर्मा
१७ / ०६ २०१५

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