Saturday, 6 June 2015

कुछ तो है
यहाँ से दूर
सपनों में तो क्या
जिंदगी की खाक छानने से
अच्छा तो है सपनों में जी लेना
कुछ अमृत उम्मीदों की पी लेना
इस समुन्द्र मंथन का विष कौन पियेगा
महादेव की जिंदगी कौन जियेगा
सुर और असुर के बीच फंसा आदमी
ज़हर बोते हुए अमृत तलाश रहा है
खेतों की कीमत पर
निवेश रत्न तराश रहा है
क्योंकि ज़मीन पर सपने नहीं होते
आसमान के घर भी अपने नहीं होते
यह कैसा स्वप्नदाह है
ह्रदय से निकलता आह है
अनिल कुमार शर्मा
०७/०६ / २०१५

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