Tuesday, 2 June 2015

उसके चेहरे पर
एक हँसता हुआ दुःख
बार- बार उभरकर  आता है
दुःख का चेहरा भी
उस चेहरे को देखकर शर्माता है
अब तो लतीफाशाही की कद्र है
और उसे फ़िक्र हमारी है
क्योंकि हमें अपनी फ़िक्र नहीं आती
जिंदगी मौत को पिघलाती
आंकड़ों के अक्स दिखाती
कुछ अजीब नींद में सुलाती
ज़मीं से हटकर स्वप्न दिखाती
अब तो दर्द भी बिकने लगे है
बाजार में अजीब ख़रीददार दिखने लगे है
पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
किसी के हिस्से की जिंदगी सिसक रही है
वह तो एक  अजीब दुनिया में भरमाता है
उसके चेहरे पर
एक हँसता हुआ दुःख
बार -बार उभरकर आता है
अनिल कुमार शर्मा
02 /06 /2015


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