किस दुःख को याद करू
किस सुख की बात करू
जीवन के झंझावातों में
कैसे कैसे जज्बात भरु
कोमल बचपन का उषाकाल
खिले यौवन की वह दोपहरी
सुरभित मधुमय संवेगों में
स्वप्निल पल अभिसार भरी
घट है यह जीवन का
या जीवन का घट घट
कंटकाकीर्ण यथार्थ पगों में
बद्ध नित्य का खट पट
कुछ मूल्य संजोये बैठा हूँ
खुद में खुद से ऐंठा हूँ
अंदर में अति आहत हूँ
संवेगों में गहरा पैठा हूँ
जीवन के इस रिक्त पात्र में
कैसे अवसाद भरे आह्लाद भरु
किस दुःख को याद करू
किस सुख की बात करू ।
अनिल कुमार शर्मा
24/02/2015
किस सुख की बात करू
जीवन के झंझावातों में
कैसे कैसे जज्बात भरु
कोमल बचपन का उषाकाल
खिले यौवन की वह दोपहरी
सुरभित मधुमय संवेगों में
स्वप्निल पल अभिसार भरी
घट है यह जीवन का
या जीवन का घट घट
कंटकाकीर्ण यथार्थ पगों में
बद्ध नित्य का खट पट
कुछ मूल्य संजोये बैठा हूँ
खुद में खुद से ऐंठा हूँ
अंदर में अति आहत हूँ
संवेगों में गहरा पैठा हूँ
जीवन के इस रिक्त पात्र में
कैसे अवसाद भरे आह्लाद भरु
किस दुःख को याद करू
किस सुख की बात करू ।
अनिल कुमार शर्मा
24/02/2015
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