इन जिंदगी भरे कतारों में
मैं भी एक कतार हूँ
जहाँ प्रारम्भ में भी कुछ था
और अंत में भी कुछ रहेगा
आदमी अपनी भाषा में सदैव कहेगा
ज़मीन में धंस कर भी
जीवाश्म होने की प्रतीति तक
संवेदनाएं पुष्ट है
जिंदगी जिंदगी से रुष्ट है
कुछ उदार तो कुछ दुष्ट है
ऊषा के प्रारम्भ से
दिवस के आलोक के पश्चात
संध्या के अवसान पर्यन्त निशा की
स्तब्द्ध प्रतीति की संवेदनाएं
सतत प्रवाह के गह्वर में
क्यों इतनी अनुत्तरित हैं
भाषा की सृष्टि में
मनुष्य का श्रुति बन जाना
चेतनामय प्रवाह का एक उत्तर है
प्रकृति चक्र की धारा से इतर
आलोड़ित अंतस्तल के भीतर है
वह मनुष्य ही है
जो बाहर भी चलता है
और भीतर भी चलता है
स्वयं की अग्नि में पिघलता है
स्वभाव का अतिक्रमण कर
सार्वभौम बनकर चलता है
काल के कारखाने में
समय के साँचे में
इतिहास बन कर ढलता है ।
अनिल कुमार शर्मा
०५/०२/२०१५
मैं भी एक कतार हूँ
जहाँ प्रारम्भ में भी कुछ था
और अंत में भी कुछ रहेगा
आदमी अपनी भाषा में सदैव कहेगा
ज़मीन में धंस कर भी
जीवाश्म होने की प्रतीति तक
संवेदनाएं पुष्ट है
जिंदगी जिंदगी से रुष्ट है
कुछ उदार तो कुछ दुष्ट है
ऊषा के प्रारम्भ से
दिवस के आलोक के पश्चात
संध्या के अवसान पर्यन्त निशा की
स्तब्द्ध प्रतीति की संवेदनाएं
सतत प्रवाह के गह्वर में
क्यों इतनी अनुत्तरित हैं
भाषा की सृष्टि में
मनुष्य का श्रुति बन जाना
चेतनामय प्रवाह का एक उत्तर है
प्रकृति चक्र की धारा से इतर
आलोड़ित अंतस्तल के भीतर है
वह मनुष्य ही है
जो बाहर भी चलता है
और भीतर भी चलता है
स्वयं की अग्नि में पिघलता है
स्वभाव का अतिक्रमण कर
सार्वभौम बनकर चलता है
काल के कारखाने में
समय के साँचे में
इतिहास बन कर ढलता है ।
अनिल कुमार शर्मा
०५/०२/२०१५
No comments:
Post a Comment