कुछ लकीरें खिंच गयी है हाथ में
कुछ लकीरें मिट गयी है हाथ से
भाग्य अपना जो भी था
आज क्यों पराया हो गया
खुद के सपनों का महल
किस गह्वर में खो गया
हरे भरे बाग़ में भी
आशियाने क्यों बिरान है
हर कदम पर ठोकरें ही ठोकरें
आज इंसान क्यों हैरान है
जो पता देती थी बहारों की
वो हवाएँ किधर बह गयीं
नदी के सूखे किनारों पर
डूबती कश्ती कहानी कह गयी
सपनों में सींची हुई कली
फूल बनने से पूर्व ही बह गयी ।
अनिल कुमार शर्मा
१८/०२/२०१५
कुछ लकीरें मिट गयी है हाथ से
भाग्य अपना जो भी था
आज क्यों पराया हो गया
खुद के सपनों का महल
किस गह्वर में खो गया
हरे भरे बाग़ में भी
आशियाने क्यों बिरान है
हर कदम पर ठोकरें ही ठोकरें
आज इंसान क्यों हैरान है
जो पता देती थी बहारों की
वो हवाएँ किधर बह गयीं
नदी के सूखे किनारों पर
डूबती कश्ती कहानी कह गयी
सपनों में सींची हुई कली
फूल बनने से पूर्व ही बह गयी ।
अनिल कुमार शर्मा
१८/०२/२०१५
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