Tuesday, 24 February 2015

अपने आदमी की  शक्ल के भीतर
ढूंढता हूँ उस आदमी के रूह को
जिसमे संक्रमण का दौर है
आत्मा और परमात्मा के बीच का आदमी
क्यों अपनी आदमियत खो दिया
तमाम धर्मो का अमरबेल बो दिया
जो  आदमी के रस को चूसकर
हरा भरा स्वरुप पाया है
खोखले आदमी के ऊपर छाया है
 क्या यही परम  पुरुष की माया है ?
अनिल कुमार शर्मा
25/02/2015

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