Sunday, 1 November 2015

मुख मयंक को मैंने देखा
प्रिय! अपनी मधु चक्षु कोटर से
श्याम मेघ में तड़ित सी
कोमल पलकों का खुलना था
स्मित अधरों पर मुक्तावली सी
चटक पंखुरियों में खिलना था
मोहक मन की मधु स्मृतियाँ
सरसिज उर पर खिली हुई
पुष्ट प्रेम की मंडप सी
उच्छ्वासों में तनी हुई
अमृतमय घट द्व्य
प्रेम पूरित तन्मय
नीहारिका  सी रजनी में
पुष्पवास सी मोहक हो
रजनीगंधा सी महमह करती
प्रिये! कितनी सम्मोहक हो ।
अनिल कुमार शर्मा
०१/११ २०१५ 

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