Wednesday, 4 November 2015

कुछ पुरस्कार लौटा रहे हैं
तो कुछ तिरस्कार लौटा रहे हैं
लो हम सारा सरोकार लौटा रहे  हैं
इस ज़मीन के मूल्यों से हट कर
उनकी गढ़ी हुई कोई ज़मीन है
जिस पर पौधे जमने से कतराते है
वे लोग तो गमलों में कुछ ज़मीन लगाते हैं
छुरी कैंची उनके पास है
काट- छांट में विश्वास है
कहते है समाज सबका है
किन्तु तरीका तो उनका है
कुछ निरा बुद्धिभक्षी हैं
कुछ छद्म बुद्धिरक्षी है
स्वयं को कहते बुद्धिजीवी हैं
इनमें अधिकतर तो गोष्ठीजीवी हैं
पहचान के लिए परेशान है
ये विचित्र इंसान है
खाली डिब्बे से घूरों पर पड़े है
रद्दी किताबों की तरह
किसी गोदाम में सड़े हैं
किसी ऊबन की तरह महक रहे हैं
बिना रास्ते के ज्यादा बहक रहे हैं
लगता है पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
उनके गमलों की मिटटी सिसक रही है
नए पौधे जमने से कतराते हैं
पुरुषार्थहीन छटपटाते हैं
बन्दर की तरह कटकटाते है
इस डाल से कूदकर
उस डाल पर जाते हैं
फिर उसी डाल पर वापस आते हैं
 विचित्र इनके रिस्ते हैं
गज़ब इनके नाते हैं
एक बात को उगल कर
पुनः उसी बात को खाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
04/11/2015

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