Saturday, 14 November 2015

मेरे जन्मदिन !
फिर आ गए उसी तरह
जैसे बार -बार आते हो
मुझे समय में चक्र की तरह घुमाते हो
धुरी और परिधि में कुछ अंक जोड़ जाते हो
इस संकुचित में कुछ विस्तार मोड़ जाते हो
मैं तो वही हूँ समय की दूरी में
जन्म के बाद हर साल बढ़ता हुआ
आसमान में सूरज की तरह चढ़ता हुआ
कभी बादलों में ढक जाता हूँ
समय की ऊंचाइयों में थक जाता हूँ
तुम्हारे आने से कुछ नयापन लगता है
बुढ़ाते समय को जैसे बचपन ठगता है
इस ठगे हुए समय में जी रहा हूँ
मित्र ! तुम्हारी शुभकामना पी रहा हूँ
इस देश ,काल के हम पात्र है
समय में बंधे हुए समय के छात्र हैं
जिसे अपनी नज़रों से पढ़ते हैं
इसे कई सांचों में गढ़ते हैं
जो ठोस होकर पिघल जाता हैं
पिघला हुआ भी ठोस हो जाता है
समय के इस आगोश में
किसका समय कहाँ खो जाता है
समय की निरंतर शिला  पर तुम
समय की धार की तरह टकराते हो
मेरे जन्मदिन ! फिर आ गए
उसी तरह जैसे बार -बार आते हो ।
अनिल कुमार शर्मा
१४/११/२०१५
४३ वां जन्मदिन


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