किस बंधन में बँधा प्रिये
सुरभित सरस डोरे से
कुञ्चित कच उर्मिल उर पर
स्पंदित मंद हिलोरे से
व्याकुल कर देती स्मित मंद
तेरी अधरों के कोने से
मंजु मनोहर भाल प्रभा
आशिष कृष्ण के बाल सखा
यमुना तट के कदम्ब कुञ्ज में
कुसुमित सुमन पर भ्रमर गूँज में
अन्तस्तल में मधुर राग बजाती हो
सुभग अनुराग जगाती हो
मधुपुरित ये नयन खुले
प्रिय मेरे मन के राह भूले
भंवरजाल इन केशों में
मंद नयन उन्मेषों में
कितनी मादक लगती हो
माया वन में खिली कुसुम सी
मुझ भौंरे को ठगती हो
ऊर्ध्वाधर प्रेम शिखर सी
कितनी विह्वल लगती हो |
अनिल कुमार शर्मा
03/11/2015
सुरभित सरस डोरे से
कुञ्चित कच उर्मिल उर पर
स्पंदित मंद हिलोरे से
व्याकुल कर देती स्मित मंद
तेरी अधरों के कोने से
मंजु मनोहर भाल प्रभा
आशिष कृष्ण के बाल सखा
यमुना तट के कदम्ब कुञ्ज में
कुसुमित सुमन पर भ्रमर गूँज में
अन्तस्तल में मधुर राग बजाती हो
सुभग अनुराग जगाती हो
मधुपुरित ये नयन खुले
प्रिय मेरे मन के राह भूले
भंवरजाल इन केशों में
मंद नयन उन्मेषों में
कितनी मादक लगती हो
माया वन में खिली कुसुम सी
मुझ भौंरे को ठगती हो
ऊर्ध्वाधर प्रेम शिखर सी
कितनी विह्वल लगती हो |
अनिल कुमार शर्मा
03/11/2015
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