Tuesday, 3 November 2015

किस बंधन में बँधा प्रिये
सुरभित सरस  डोरे से
कुञ्चित कच उर्मिल उर पर
स्पंदित मंद हिलोरे से
व्याकुल कर देती स्मित मंद
तेरी अधरों के कोने से
मंजु मनोहर  भाल प्रभा
आशिष कृष्ण के बाल सखा
यमुना तट के  कदम्ब कुञ्ज में
कुसुमित सुमन पर भ्रमर गूँज में
अन्तस्तल में मधुर राग बजाती हो
सुभग अनुराग जगाती  हो
 मधुपुरित ये नयन खुले
प्रिय मेरे मन के राह भूले
भंवरजाल इन केशों में 
मंद नयन उन्मेषों में
कितनी मादक  लगती हो
माया वन में खिली कुसुम सी
मुझ  भौंरे   को ठगती हो
ऊर्ध्वाधर प्रेम शिखर सी
कितनी विह्वल लगती हो |
अनिल कुमार शर्मा
03/11/2015



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