Thursday, 10 December 2015

यह जो है जहाँ है जैसे है
सवाल यह है, क्यों है? और  कैसे है ?
मुझे बहुत कुछ याद आता है
बहुत कुछ भूल जाता है
बहुत कुछ तर्क से जानता हूँ
बहुत कुछ विश्वास से पहचानता हूँ
श्रुति और स्मृति के दर्शन से परे
प्रश्नांकित संदेह कितने भरे
मुझे क्यों इतना  विश्वास होता है
मुझे क्यों फिर  संदेह होता है
निर्णय के बाद भी क्यों द्वन्द होता है
कही पराग तो  कही मकरंद होता है
कुछ काँटों में उलझी जिंदगी
कुछ काँटों में उलझाती जिंदगी
पुष्प की इच्छा लिए मर रही है
व्यवस्था विचित्र न्याय कर रही है
लगता है  न्यायपालिका में भी निवेश होता है
इंसाफ का भी  कितना गजब वेश होता है
 मर गया दब कर  फूटपाथ पर जो आदमी
छूट गया  विमान से दाबकर वो आदमी
देख लो इस आदमी को मिल कर सब आदमी
फूटपाथ वाले करते रहो दादामाई
समरथ के नहीं दोष गोसाईं ।
अनिल कुमार शर्मा
10/12/2015







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