इन छले हुए उजालों में
अब अँधेरे सैर करते है
रोशनी लिए ये चिराग भी
क्यों रंगीन अंधेरो से डरते हैं ?
सपने दिखा कर जो हमसे नींद छीने हैं
अँधेरों से निकलने की उम्मीद छीने हैं
खयाली रोशनी के जो जाल बीने है
दमकते हुए ये कितने कमीने हैं
लगी भूख की जो आग तापते है
नंगे जिस्म की औकात नापते है
जमींन छीन कर आसमान मापते है
धरती का बढ़ता तापमान बांचते हैं
डूबते शहर में अपना निशान खांचते हैं
अब तो घरों में दुकान सजाये हुए है
ये बेशर्म कितने लजाये हुए हैं
कितने बिके और बिकाये हुए है
सिरहाने की ओर अब पैर करते हैं
इन छले हुए उजालों में
अब अँधेरे सैर करते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
08/12/2015
अब अँधेरे सैर करते है
रोशनी लिए ये चिराग भी
क्यों रंगीन अंधेरो से डरते हैं ?
सपने दिखा कर जो हमसे नींद छीने हैं
अँधेरों से निकलने की उम्मीद छीने हैं
खयाली रोशनी के जो जाल बीने है
दमकते हुए ये कितने कमीने हैं
लगी भूख की जो आग तापते है
नंगे जिस्म की औकात नापते है
जमींन छीन कर आसमान मापते है
धरती का बढ़ता तापमान बांचते हैं
डूबते शहर में अपना निशान खांचते हैं
अब तो घरों में दुकान सजाये हुए है
ये बेशर्म कितने लजाये हुए हैं
कितने बिके और बिकाये हुए है
सिरहाने की ओर अब पैर करते हैं
इन छले हुए उजालों में
अब अँधेरे सैर करते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
08/12/2015
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