दारु पीते प्रख्यात कवि को मैंने देखा
जन की चिंता करते होटल में
जीभ डुबोये बोतल में
कुछ क्रान्तिकांक्षी जुटे हुए थे
बोद्का व्हिस्की लुटे हुए थे
जाम लड़ाते बुर्जुवा पर टूटे हुए थे
पिलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
मयखाना धरा पर कही रह न जाए
अकाल में सारस मय पीकर गाये
कविता की धुन में हिचकी आये जाए
बाघ बुझौनी खूब बुझाए
अभी बिलकुल अभी यही सुझाये
यह कविता कितनी बातें ढक रही है
किसकी ज़मीन कब पक रही है
यहाँ से देखो जिंदगी थक रही है
सड़े वसूल में एक पकी ज़मीर है
मुंशी जी के खोल में कही कबीर है
हो रही कब्रिस्तान में पंचायत है
गवाह चुस्त मुद्दई गायब है
आँखों के आगे कुछ भी हो
पर नज़र ठहरती बोतल में
दारू पीते प्रख्यात कवि को मैंने देखा
जन की चिंता करते होटल में ।
अनिल कुमार शर्मा
०४/१२/२०१५
जन की चिंता करते होटल में
जीभ डुबोये बोतल में
कुछ क्रान्तिकांक्षी जुटे हुए थे
बोद्का व्हिस्की लुटे हुए थे
जाम लड़ाते बुर्जुवा पर टूटे हुए थे
पिलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
मयखाना धरा पर कही रह न जाए
अकाल में सारस मय पीकर गाये
कविता की धुन में हिचकी आये जाए
बाघ बुझौनी खूब बुझाए
अभी बिलकुल अभी यही सुझाये
यह कविता कितनी बातें ढक रही है
किसकी ज़मीन कब पक रही है
यहाँ से देखो जिंदगी थक रही है
सड़े वसूल में एक पकी ज़मीर है
मुंशी जी के खोल में कही कबीर है
हो रही कब्रिस्तान में पंचायत है
गवाह चुस्त मुद्दई गायब है
आँखों के आगे कुछ भी हो
पर नज़र ठहरती बोतल में
दारू पीते प्रख्यात कवि को मैंने देखा
जन की चिंता करते होटल में ।
अनिल कुमार शर्मा
०४/१२/२०१५
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