Wednesday, 14 October 2015

इस समय की खड़खड़ाहट  में
इतना खड़खड़ा रहा हूँ
ज़मीन पर फड़फड़ा रहा हूँ
कुछ ज़मीनें छूट गयी हैं 
कुछ अभी बिलकुल नयी हैं
पथराये हुए  पांव मेरे
ठूँठ  के ये छाँव घेरे
घोसले जो थे उजड़ गए
नीड़ के   लाले पड़ गए
समय से कटकर भी
जो जिंदगी बच गयी  थी
अब लूटी उम्मीदों में
घुट घुट कर मर रही है
अप्रत्याशित भय से डर  रही है
अब तो सपने भी डराते हैं
वो लोग ऐसा क्यों कराते हैं
सुकून देती इस इमारत को
किस वजह से गिराते हैं
अब राह चलते भी
पैर क्यों इतने लड़खड़ाते है
जंगलों  में शहर और शहर में जंगल
उजड़े  गांव से तडफ़ड़ाते हैं
अनिल कुमार शर्मा
14/10/2015




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