इस समय की खड़खड़ाहट में
इतना खड़खड़ा रहा हूँ
ज़मीन पर फड़फड़ा रहा हूँ
कुछ ज़मीनें छूट गयी हैं
कुछ अभी बिलकुल नयी हैं
पथराये हुए पांव मेरे
ठूँठ के ये छाँव घेरे
घोसले जो थे उजड़ गए
नीड़ के लाले पड़ गए
समय से कटकर भी
जो जिंदगी बच गयी थी
अब लूटी उम्मीदों में
घुट घुट कर मर रही है
अप्रत्याशित भय से डर रही है
अब तो सपने भी डराते हैं
वो लोग ऐसा क्यों कराते हैं
सुकून देती इस इमारत को
किस वजह से गिराते हैं
अब राह चलते भी
पैर क्यों इतने लड़खड़ाते है
जंगलों में शहर और शहर में जंगल
उजड़े गांव से तडफ़ड़ाते हैं
अनिल कुमार शर्मा
14/10/2015
इतना खड़खड़ा रहा हूँ
ज़मीन पर फड़फड़ा रहा हूँ
कुछ ज़मीनें छूट गयी हैं
कुछ अभी बिलकुल नयी हैं
पथराये हुए पांव मेरे
ठूँठ के ये छाँव घेरे
घोसले जो थे उजड़ गए
नीड़ के लाले पड़ गए
समय से कटकर भी
जो जिंदगी बच गयी थी
अब लूटी उम्मीदों में
घुट घुट कर मर रही है
अप्रत्याशित भय से डर रही है
अब तो सपने भी डराते हैं
वो लोग ऐसा क्यों कराते हैं
सुकून देती इस इमारत को
किस वजह से गिराते हैं
अब राह चलते भी
पैर क्यों इतने लड़खड़ाते है
जंगलों में शहर और शहर में जंगल
उजड़े गांव से तडफ़ड़ाते हैं
अनिल कुमार शर्मा
14/10/2015
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