Thursday, 7 May 2015

 बहस में है दुःख
और बहस में है सुख भी
अब उम्मीद भी बहस में है
करवटें किधर से किधर बदलती हैं
बदलती बहस भी बहस में है
सिर्फ मेरा दुख और
तुम्हारा दुःख अपना है
उम्मीदों पर बसा सुख
मात्र एक सपना है
बहस के कारीगर
अब सपने  छीन रहे हैं
हम दुःखी लोग
दुःख के ज्वालामुखी में
सिर्फ अपना दुःख
गिन रहे हैं
अनिल कुमार शर्मा
08 /05 /2015

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