Sunday, 31 December 2017

अलविदा उनको जो गुजर गए वक्त के साथ
स्वागत उनका जो आएंगे वक्त के साथ
कुछ हाथ हिलाते हुए चले गए
कुछ हाथ मिलाते हुए आ रहे हैं
वक्त के नशेमन में छा रहे है
बीते हुए बदरूप कुहरों में
नए उजालों  की उम्मीद ला रहे हैं
चेहरे वही हैं और मोहरे भी वही हैं
सिर्फ तारीखें बदल गयी हैं
मामूली सी उम्मीद ढल गयी है
वक्त में कोई चीज गुजर गयी है
वक्त में मैं सिमट रहा हूँ
और वक्त गुजर रहा है
खामोश शोरगुल की तरह
अर्थ की खोल ओढ़े अर्थहीनता
समृद्धि की गीत गाती दीनता
चाक- चौबंद  हैं पहरुए
 किसी उम्मीद में जुटे हुए
खुद से खुद को लुटे हुए
उम्मीद की कली चटक रही है
वक्त की डाल पर लटक रही है
नए की उम्मीद में पुराने को झटक रही है
वक्त पसारता कोई और है
 वक्त समेटता कोई और है
दोस्त वक्त का सुनहरा जाल है
मुबारक नया साल है |
@ अनिल कुमार शर्मा
०१/०१/२०१८



Tuesday, 15 August 2017

किसकी कितनी आजादी है
धोती कुरता खादी है
जय बोलो महात्मा गाँधी है
डंडे में लटका एक झंडा है
उसके ऊपर एक फंदा है
जिससे  डोरी लटक रही है
हवाएँ किसको झटक रही हैं
खूनी पंजो में सिसक रही है
आज़ादी क्यों झिझक रही है
जगह है जिनकी कारागारों में
संसद को  हथियाये बैठे है
अपने दुर्दम पैरों से
जनमत को  लतियाये बैठे है
 भूखी जनता के ऊपर तो 
उनकी भर रही  तिजोरी है
अफसर के ऑफिस में
रोज  बढ़ रही घूसखोरी है
सत्ताधारी उन्मादों में
क़ानूनी गहरी  माँदों में
विषधर से लहराते है
आज़ादी के झंडे को
तिकड़म से फहराते  है
सड़ी हुई नैतिकता में
निरर्थक आदर्श बतियाते है
किसी तरह से कहीं भी
कुर्सी को हथियाते है
अब आदर्श यहाँ पर कुर्सीवादी है
किसकी कितनी आज़ादी है ?
अनिल कुमार शर्मा
15 /8 /2017







Sunday, 13 August 2017

           कुर्सीवाद
यहाँ न तो  बीज है न खाद है
अब जिंदगियां  सिर्फ बरबाद हैं
सपनों से पहले या सपनों के बाद है
मित्र सिर्फ सत्ता का  कुर्सीवाद है
यहाँ तो सिर्फ घुटन है टूटन है
जिंदगी के सफर का छूटन है
अब तो कोई कली  नहीं खिलती
क़र्ज़ पर भी साँस नहीं मिलती
निवेश के लिए घूमता  नंगा है
शांति के ढोंग में फैलता दंगा है
अब समय कितना हो  गया अजीब
नवजातों को उम्र भी नहीं होती  नसीब
इस विकास के अँधेरे में किधर भटक रहे हैं
स्वर्ग की तलाश में त्रिशंकु जैसे लटक रहे हैं
यह क्या है ? रोशनी है या रोशनी का धोखा है ?
नमक लगे न फिटकिरी और रंग भी  चोखा है
आशा की टहनी पर छा गयी निराशा
गंगा जी की नियत बन  गयी कर्मनाशा
सत्य पर झूठ हो रहा आबाद है
इस दौर में सिर्फ कुर्सीवाद है
जब आदमी कुर्सी में ढलता है
पूँजी के टुकड़ों पर पलता है
कुर्सी की बोली बोलता है
खाली जेब टटोलता है
अपनी संवेदनाओं को मारता है
भीतर के इंसानियत  डकारता है
विषधर की तरह फुँफकारता है
बिच्छु की तरह डंक मारता है
 न सवाल है न जबाब है
उसका सतरंजी अंदाज़ है
अजीब कुर्सीवाद है |
अनिल कुमार शर्मा
13 / 8 /2017





Tuesday, 4 July 2017

परेशान आदमी 
परेशान होने वाला आदमी
परेशान करनेवाला आदमी
परेशानी हटानेवाला आदमी
सब परेशान हैं
दोषारोपण आसान है
जिस तरह जो है
और जिस तरह उसे होना चाहिए
सवाल यह है  कि क्यों होना चाहिए ?
अस्तित्व कठिन है
और अस्तित्व आसान भी है
जो है उससे ज्यादा उस पर आरोपित है
क्रोध कम  क्रोधबोध ही ज्यादा कुपित है
पहाड़ पर मैं हूँ
या पहाड़ मुझ पर है
नदी के किनारे मैं हूँ
या नदी मेरे किनारे पर है
दिन और रात मेरे लिए है
या दिन और रात की नियत में मैं हूँ
सूरज डूबता है और उगता है मेरे लिए
अँधेरे और उजाले में क्यों कोई अर्थ  ढूंढता हूँ
अस्तित्व का खोल ओढ़े क्यों अस्तित्व पर कुढ़ता हूँ
क्यों हवा में जहर घोलता हूँ
परिधि की खोज परिधि से बाहर नहीं जाती
पदार्थ पर प्रत्यय की धारणा बनाती
उगे हुए प्रश्न को काटता हूँ
पद,पदार्थ और प्रत्यय में बाँटता हूँ
दर्शन के पद चिन्हों को चाटता हूँ
कुछ भूला  नहीं है  फिर भी खोजता हूँ
पूर्णता को खण्ड -विन्यास से बोझता हूँ
न अल्प हूँ न महान हूँ
अर्थ और अनर्थ के मध्य परेशान हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
04/07/2017


Friday, 30 June 2017

There is the politics occupied chair
Where I hurl the shoe of my soul
They want to tear the clothe of my spirit
That is in old rags like body left by the soul
I know the risk of tattered existence
But falling all around the hell
This is power's intoxicating smell
I live the illusion of temporal fraud
Friend I sail my faith in unknown sea
I have left one shore in vast waters
Up and down, down and up
My weak foundations facing the waves
All streams teach me like naive
Like full of emptiness in utter void
I taste all without any test
What may come and what may go
Where I dare to defeat the foe.
Anil Kumar Sharma
30/06/2017




Wednesday, 28 June 2017

मैं कहूँगा मित्र
तुम्हारे कान के पर्दे फटने तक
अपनी आवाज़ के तेवर में
दास्तान उनकी
जहाँ रोज़ ज़िंदगियाँ मरती हैं
रंगीनी में संवेदनहीन सत्ताएं चरती हैं
बीज की विरासत ढ़ोती ये उर्वरताएँ
कठिन समय को बोती हैं
चूल्हा बुझा गायब रोटी है
ज़मीन से उठकर आसमान पर जाना
आसमान के दायरे से ज़मीन को देखना
ज़मीन पर कुछ आसमानी टुकड़े फेंकना
आखिर यह कब तक चलेगा ?
धरती का कलेजा कब तक जलेगा ?
ज़मीन चबाते लोग ये
कुछ हवाई ज़मीन गढ़ते हैं
हवा बनाकर उसी हवा में उड़ते हैं
अब तो हवाओं की दुकान सज रही है
ज़मीन पर हवाई राग बज रही है
अब तो जंगल भी भयभीत है
नदी -नाले हो रहे अतीत है
पहाड़ गलने लगा
परिवेश जलने लगा
हवा ज़हर बनने लगा
जिसका पानी मर चुका
वह पानी बेच रहा है
बुड्ढों की जवानी बेच रहा है
धुन्ध में ढकेलती कहानी बेच रहा है
हमारी ज़मीन छीन कर
बुलबुले आसमानी बेच रहा है |
-------------अनिल कुमार शर्मा
                  26/06/2017





Sunday, 25 June 2017

                                                  कंगाल होता जनतंत्र : एक आकलन 
                                                                                लेखक - गंगाधर "सुमन"
                                                                   पूर्व प्रवक्ता (अंग्रेजी ), खालिसपुर इण्टर कॉलेज ,ग़ाज़ीपुर
                                                                                वरिष्ठ कवि एवं समीक्षक
             युवा कवि अनिल कुमार शर्मा का प्रथम काव्य संग्रह 'कंगाल होता जनतंत्र '  मुझे दिनांक २१-०४-२०१५ को श्री शर्मा द्वारा सस्नेह  प्राप्त हुआ | संजोग था एक उद्घाटन समारोह  जहाँ मैं गया था | कवि अनिल कुमार शर्मा भी वही थे | परस्पर परिचय डॉ पी ० एन ० सिंह ने कराया | वैसे श्री शर्मा की प्रखर प्रतिभा  के बारे में   मैं   एक मित्र से पहले भी सुना था | सम्भवतः  यह संग्रह लगभग बीस वर्षों का प्रयास है | इस संग्रह में कुल पचहत्तर रचनाएं हैं | इनके भाव, कोण  और त्वरा अलग-अलग हैं|  विज्ञानं ,राजनीति ,व्यवस्था , धर्म ,समाज और जीवन को स्पर्श करती विकृतियों पर कवि  ने   पुरजोर  लेखनी चलायी है , जिसको उसने अपने जीवन में चारो  ओर भोगा और झेला है | इन कविताओं से व्यंग के साथ -साथ कवि का आक्रोश भी साफ प्रकट होता है | संग्रह के प्रथम (कवर ) पृष्ट के पीछे   कवि  ने  इस संग्रह को लिखने का मंतव्य भी स्पष्ट किया है |
                                           भावनाओं में भावनाएं फँसती है,
                                           चीखती हैं ,रोती हैं , हँसती हैं ,
                                           संवेदनाएं शब्दों में कसती हैं |
          आगे बढ़ने पर 'दो शब्द' मिलता  है | कवि कहता है - भावनाओं की छटपटाहट को शब्दबद्ध करने का प्रयास मेरी कविता है | आगे कवि फिर कहता है - ' इस संकलन में सामान्यतः मैंने सामाजिक विसंगतियों को व्यंग काव्य   के रूप में  अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है | लगभग सत्रह पृष्ट की भूमिका में  पूरे काव्य संग्रह का परिचय दिया गया है | संग्रह की अधिक कविताओं से उद्धरण भी प्रस्तुत है | डॉ पी ० एन ० सिंह ने कवि शर्मा को विलियम  वर्ड्सवर्थ के बहुत नजदीक बताया है , क्योंकि संग्रह की कवितायेँ छंद विधान और व्याकरण पाश से मुक्त हैं | साथ ही अनिल को बुद्धिजीवी न होकर बुद्धिधर्मी होने का सुझाव भी दिया है और उसका कारण भी बताया है | संग्रह की भूमिका और 'दो शब्द' को  पढ़ने के बाद , मैंने संग्रह की सभी कविताओं को पढ़ कर यह जानने का प्रयास किया कि वास्तव में  कवि और भूमिका लेखक ने जो कहा है , वही भाव ,अर्थ या व्यंग इन कविताओं में सृजित होता है |
          संग्रह की रचनाओं में समाज की विद्रूपता और   उसके  बीच खड़ा आदमी अपने रिश्तों को सम्हालता शून्य में स्तब्ध खड़ा दीखता है | महंगाई ,भ्रष्टाचार और अनैतिकता की चक्की में पिसता निम्न और मध्यवर्ग तथा आदमी से आदमी के टूटते सम्बंधों के दर्द को युवा कवि ने बड़ी संजीदगी से अपनी कविताओं में उभारा है, इससे रचनाओं का व्यंग बहुत प्रभावशाली और दो- टूक होता गया है | कहीं -कहीं तो व्यंग की त्वरा काफी  तीक्ष्ण है | जीवन में रोजमर्रा की विसंगतियों पर किये गए प्रहार बहुत संवेदनशील और कटु हो गए हैं | व्यवस्था की विसंगतियों पर कवि का प्रहार जिंदगी के उन लमहों तक असर डालता है जो कुछ बनने ,रचने और धीरज तक तनहा ,एकदम तनहा खामोश हो जाते हैं | कुछ कविताओं से मुझे स्पेनिश लेखक गाबिरियल मार्सिया मार्कल की पुस्तक ' वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सालिंटयुड ' की याद ताज़ा हो जाती है , जहाँ उसने समाज में बढ़ती  विसंगतियों के बदरूप चेहरे पर बार -बार चोट  किया है | कवि शर्मा की कुल मिलाकर यही उपलब्धि है | लगता है कवि कुछ खोज रहा है , लेकिन चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है | कवि समय ,समाज,और परिवेश से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहता है | इसलिए वह मन की  आँखों से भीतर और बाहर झाँकता है और इसी से  जीवन की विवशताओं और सीमाओं को परिभाषित करना चाहता है | वैसे यह काव्य यात्रा इन विवशताओं और सीमाओं का अतिक्रमण करके कहीं -कहीं आगे भी निकल गई है |
          संग्रह की कई कवितायेँ जीवन को अर्थ देती हैं और सामाजिक कुरीतियों ,रहस्यों और विद्रूपताओं का परदा  भी उठाती चलती हैं | कवि अपने समय के माध्यम से अपने को पहचानने की कोशिश करता है ,  जिससे जाने -अनजाने कविताओं को नये  आयाम और नये अर्थ मिलते गए हैं | इससे कवि की पीड़ा और द्वन्द को समझना सरल हो गया है | यहाँ एक प्रश्न भी खड़ा होता है कि जब दुःख ही जीवन की कथा है तो प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ? इन कविताओं से आभास होता है कि कवि शर्मा को परिवर्तन और अमन की तलाश है ,  वही परिवर्तन जो सृष्टि का अटल नियम है | संग्रह की कवितायेँ काव्यगत एक सिस्टम के साथ जुडी रहकर  बदलाव के नये आयामों का उद्घाटन करती हैं | भूमिका में उद्धृत कुछ कवितायेँ इसका उदहारण हैं | इससे यह भी ज्ञात होता है कवि  जिज्ञासु है और  जिज्ञासा सदैव समय ,समाज और व्यवस्था से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहती है | इस संग्रह की कविताओं का यही मर्म है | निर्भेद कवि अपने मन्तव्य में बहुत सफल है और उसकी रचनाधर्मिता सराहनीय और सार्थक है | कवि की इसी सोच से शब्दों का भाव और विचारों में आना -जाना एक कविता हो जाता है | कवि भी स्वयं कहता है - बुद्धि ,भाव और शब्द अकेले कविता नहीं हो सकते |
                                      शब्दों की सीमा से पार हो
                                      कविता तुम अलग संसार हो
संग्रह के आने में एक लम्बा समय लगा है | वय के अलग -अलग स्तर पर लिखी गयी ये कवितायेँ अल्पवय और प्रौढ़वय की रचना क्षमता का प्रतिमान हैं | फिर भी अपने भाव और अर्थ में सभी अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी हैं | महान जर्मन लेखक गुंटर ग्रास का मानना है कि ईमानदारी से किये गए कार्य को पहचान जरूर मिलती है | ग्रास का मानना था कि अभ्व्यक्ति का पैमाना भावनाएं होती हैं , राजनितिक समीकरण नहीं | उनका स्पष्ट कथन है कि साहित्य को पूर्वाग्रह के पैमाने से मापना साहित्य की गुणवत्ता से समझौता करना है | कवि ने धर्म , राजनीति  , विज्ञानं , साहित्य , गणित , पाखंड , वर्ण ,वर्ग और व्यवस्था की कलई खोला है | इस संग्रह की किसी भी कविता पर अंगुली उठाना उस कविता के भावबोध और सत्यता पर पर्दा डालना या कवि की भावनाओं को हतोत्साहित करना है | वक्ररेखा , शून्यवाद, खुदा के खेत में , सुनो किसानों , भ्रष्टाचार जी , भगत सिंह तुम्हारे बमों का इंतज़ार है , रियलिटी शो का सौंदर्यशास्त्र  जैसी कई अन्य रचनाएँ हैं जो सबको कुछ सोचने के लिए झकझोरती हैं | संग्रह की कविताओं के भिन्न -भिन्न विषय , तद्-रूप    भाव संयोजन और तद्नुसार शब्द -चयन , प्रभाव और प्रवाह कवि की रचना कला और क्षमता को एक ठोस आधार प्रदान करती है | डायरिच वॉन होपर कहता है कि प्रेरणादायी दमदार रचना की परीक्षा यही है कि वह नयी पीढ़ी के लिए किस तरह की दुनिया रचती है | संग्रह की कुछ कविताओं , जैसे - फूल नहीं, कांटे नहीं, यह सोचकर मैं सोचता हूँ कि क्या सोचूँ , ऐ अजीब जिंदगी ये क्या देखता हूँ ,से ग़ज़ल की सुगंध और नए प्रयोग का आनंद मिलता है | कविता " मृत जीवन" में काव्यगत स्थापित परम्परा और प्रतिमान को बहुत सम्भल  कर अपनाते हुए सधे व्यंग की चुभन की सुन्दर प्रस्तुति है |
              आज उदारीकरण , ग्लोबलाइजेशन , बाज़ारीकरण की खूब चर्चा है | आरक्षण का कोढ़ इन पैंसठ वर्षों में विवाद का केंद्र बना हुआ है | जनतांत्रिक भारत का संविधान कितना बेचारा बना हुआ है | विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका की क्या दुर्दशा है , कवि ने सबको गहराई से समझा है और इनकी स्थिति को परत दर परत उधेड़ कर रख दिया है | सामाजिक मूल्यों के क्षरण और सांस्कृतिक विडम्बना पर अनेक कवितायेँ हैं , यह कवि की पीड़ा  और उसके भाव -विन्दु को समझने के लिए काफी हैं | कवि जानता है कि  आज आदमी एक अफवाह मात्र है | इसलिए कवि की बहुविध चिंतन से सहमति -असहमति भले हो , लेकिन उसकी रचना क्षमता की सत्यता से इंकार  नहीं किया जा सकता | एक कवि की कुछ पंक्तियाँ इस सन्दर्भ में पठनीय हैं -
                                          एक आदमी में सिर्फ एक आदमी ही नहीं
                                         कई आदमी रहते हैं , अलग-अलग रिश्तों में |
             डायरिच वॉन होपर कहता है - आदर्श रचना की सही परीक्षा यही है कि वह नयी पीढ़ी के लिए किस प्रकार  की दुनिया रचती है और क्या सन्देश देती है | कविता 67 'भ्रम में जीता मैं कवि हूँ ' तक आते ही कवि का व्यंग  पूरे  यौवन पर आ जाता है | आज के कवि , लेखकों और समीक्षकों की सोच और रचना का क्या स्तर है - पंक्तियाँ देखें |
                                          अब तो लगता है मुझे
                                          कि कवि हो गया हूँ
                                          किसी कबाड़ में खो गया हूँ |
समीक्षकों की स्थिति की झलक -
                                         खेमे के ऊपर खेमा धरता नामवर है |
कवि ऐसे सारे छद्म ,गुटबाज -मठाधीशों की पोल खोलते हुए कहता है कि आज सभी जय शंकार प्रसाद , सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला ' ,दिनकर, गुप्त और धूमिल हो गए हैं | दस-बीस लोगों का खेमा या भीड़ बटोरकर साहित्य रचना का जो ढोंग किया जा रहा है , कवि उनके भ्रम  को प्रतीकों से स्पष्ट करता है | इस संग्रह की कविताओं में तीखा ,कड़वा या निर्भीक व्यंग वास्तव में छद्म -स्थापनाओं का पर्दाफाश करता है जो अनायास कुछ न होकर भी अपनी मिथ्या गुरुता की डींग मारते हैं | संग्रह की सभी कवितायेँ कविता के समस्त प्रतिबंधों जैसे  शैली ,व्याकरण ,विधान और मीटर से मुक्त कवि की स्वतंत्र और मनचाही अभिव्यक्तियाँ हैं | कवि जो कह रहा है क्या वह सत्य के निकट नहीं है ? कमीज़ की दो जेबों में दायी वाली आज भी भरी और मान्यताप्राप्त है और मूलतः वही साहित्यिक सीमाओं में सर्वोपरि है और बायीं जेब लाख उछल -कूद के बाद भी खाली है | तर्क ,जिद्द ,ज्ञान -नाम के भरोसे चाहे जो कहा जाय , सच्चाई को हठात नकारना आसान नहीं है | हिंदी साहित्य का इतिहास इसका साक्षात् प्रमाण है | कलम की गोलबंदी से स्वस्थ्य साहित्य और गंभीर चिंतन का प्रभावित और उदास होना स्वाभाविक है | तुलसीदास का समन्वयवादी स्वर और कबीरदास का पाखण्ड आलोचक स्वर का आधार अध्यात्मिक ही है | दोनों ने समाज को उत्तम सीख और सही दिशा दिखाया है | फिर किस मूल स्वर को पकड़ने का प्रयास ' दूसरी परम्परा की खोज ' है ? क्या - चश्में की नज़र पर / नाक की ऊंचाई हावी है / क्या इसके इर्द -गिर्द सिंह और पूँछ'  नहीं है ? क्या आज की आलोचना ' सात अंधों का हाथी का वर्णन' नहीं है ?-- ' यह आदमी कलम की गोलबंदी करता है /  एक  कलमधारी से दूसरे कलमधारी पर वार करता है / एक बार नहीं हर बार करता है /   . . . . . . . . . . . . . .  ' उसकी चारण चिट्ठियाँ राष्ट्र की धरोहर हैं / उसका अंगूठा छाप भी किसी की सफलता का मोहर है /' ये पंक्तियाँ क्या कहती हैं ?
              अंत में मैं अपना आकलन  कवि की अंतिम कविता  ' यही परिवर्तन है ' को उद्घृत कर , लेख की लम्बाई को देखते हुए समाप्त करना चाहता हूँ |
                                       ' एक महापुरुष अपनी आँखों को बंद किये
                                         मधुर स्वर में
                                        मेरी नंगी आँखों का सच
                                        परिकल्पनाओं और विचारों में लपेटकर
                                       कई खिड़कियों - दरवाजे वाले 
                                      कई मंजिली सिद्धांतों की सीढी पर
                                       चढ़ा रहे थे , उतार रहे थे
                                      सत्य के स्वरुप को चाक़ू -कैंची
                                       बसूले से सुधार रहे थे
                                      उनका सत्य शिव था, सुन्दर था
                                      जो सत्य मैंने देखा था
                                      उससे बेहतर सत्य उनकी आँखों के  अन्दर था |
                                                     ------------------------------


Wednesday, 21 June 2017

Image result for गाजीपुर सिटी
इस फीके शहर में कुछ चमक आयी है
एक बरसने वाली घटा छायी है
यह शहर बहुत दिनों तक लाल रहा
क्रांति के सपनों में कंगाल रहा
किस्मत में फटेहाल रहा
इस बंजर में एक फूल खिला है
वैसे तो यह क्रांतिकारियों का जिला है
न तो किसी से शिकवा है
न ही किसी से  गिला है
अफीम फैक्टरी का भोंपू जगाता है
गंगा जी  का भी कुछ नाता है
 पिछड़ेपन का बही -खाता है
इसकी दास्तान  खूब है
एक अजीब सी ऊब है
न प्राचीर है न कपाट है
इसका चेहरा सपाट है
फिर भी गुलाबी महक है
अफीमी बहक है
यह शहर विचित्र है
धूल  छिड़कता इत्र है
अब इस बेनाम शहर में जाम लगने लगा
मतलब साफ है  विकास दिखने लगा
इस फीके शहर में कुछ चमक आयी है
एक बरसने वाली घटा छायी है |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०६/२०१७




Thursday, 15 June 2017

तुम्हारी मोहब्बत है
बासी अख़बार की तरह
कसमे -वादे है
अपनी सरकार की तरह
एक शिगूफा है
और सनसनी है
सिर्फ अंगुली तनी है
हाथ खाली है
कारोबार जाली है
कंगाली में आटा गीला है
कोई पेंच ढीला है
चेहरा रोबीला है
अंदाज़ रंगीला है
विकास का धंधा है
गाय का बंदा है
धर्म का फंदा है
स्वच्छता अभियान में
कही कुछ गन्दा है
अब आंकड़े नायब हैं
रोजगार गायब है
नाव की दिशा है
बिना पतवार की तरह
तुम्हारी मोहब्बत है
बासी अख़बार की तरह
अनिल कुमार शर्मा
15/06/2017

Sunday, 21 May 2017

बादल को देखता हूँ
किन्तु बादल में नहीं हूँ
यह ज़मीन करवट लेती है
और ऊंट पहाड़ के नीचे आता है
कभी कभी ऐसा भी होता है
मियां की जूती मियाँ के सर
असरदार बात हो जाती बेअसर
माहौल जाता एकदम पसर
कामयाब होती नाकामयाबी
हक़ीक़त हो जाती ख्वाबी
अब तो वह ख्वाब देखता  है
बाजार का इंकलाब बेचता है
बात खिलाता है बात पिलाता है
सिर्फ बात को बात में जिलाता है
बेहयाई की हद तक नाकामयाबी मनाता है
हम इस तिलिस्म में भूले हुए लोग है
नमक की हाड़ी की तरह गले हुए लोग है
पत्थर खाने के बन गए अब  संजोग हैं
इस मशीन के हम  उपभोक्ता और उपभोग है
विकासधन्धियों के विकसित उद्योग हैं |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०५/२०१७





Saturday, 13 May 2017

वह जो गोद में दूध पिलाते हुए
चूल्हे के आगे रोटी बनाती है
एक हाथ से  बच्चे को खिलाती है
दूसरे हाथ से सब्जी चलाती है
वह माँ है जो घर को चलाती है
गिरते हुए बच्चे को उठाती है
सहलाती है दुलराती है
जगाती है सुलाती है
लोरी और कहानी सुनाती है
जवानी और बुढ़ापे को माँ
तुम्हारी याद बचपन बनाती है
मेरे लिए कितने मन्नते मनाती है
किसी की नज़र न लगे
आँचल में छुपाती है
इस नन्ही सी दुनिया में
मेरी माँ ही अरमान सजाती है
रिस्ते बहुत से बनेगे बिगड़ जायेंगे
किन्तु माँ हम तुम्हारे पास ही आएंगे
तुम्हारे आँचल से बिछड़ कर कहाँ जायेंगे |
अनिल कुमार शर्मा
१४/०५/२०१७



Sunday, 7 May 2017

वह तोड़ता भूत
जोड़ता भविष्य
फोड़ता वर्तमान
जिसे मैंने देखा
कचहरी के पथ पर
चीथड़ों के साम्राज्य पर
गर्दिश में खोयी किस्मत के बीच
पिजड़े में बैठा तोता
किसी  का भाग्य विधाता होता
गत्ते के ढ़ेर में उलझे हुए भाग्य लेख
उलझती हुई जिंदगी को देख
समाधान के पक्ष विपक्ष
कर देते किंकर्तव्यविमूढ़
ग्रह - नक्षत्रों के चक्रव्यूह में फंसा जीव
शायद ही कोई निजात पाता है
तोता पिजड़े से बाहर आता है
भाग्य के लेख को चोंच से उठाता है
भविष्यदर्शी उसे बाँचता है
स्लेट पर आड़ी -तिरछी रेखाएं खांचता है
अंगुली पर कुछ गिनता है
दो चार अंगूठी बीनता है
राहु केतू शनि को भगाता है
बजरंगबली को जगाता है
किस्मत के बाद बची कचहरी है
सबूत और गवाही में बुद्धि हरी है
अब तो घुन पिसता है
बच जाता जौ साबूत
वह तोड़ता भूत |
@ अनिल कुमार शर्मा
हास्य दिवस पर अप्रेम
07/04/2017



                                     ग़ज़ल
सुबह   हो गयी    मग़र     रात     अभी  बाक़ी है |
इस रोशनी में अब कोई साज़िश झिलमिलाती है | |
सूरज     बहकता     सा   चाँदनी   मुस्कुराती है |
हवा का रुख बताने में पत्तियां लड़खड़ाती हैं | |
धुँवा इस कदर  पसरा        आंखें डबडबाती हैं |
दीया बुझा -बुझा सा  जली -जली सी बाती है | |
इस तरह सजी ज़िन्दगी जिन्दगी को ऊबाती है |
रंगीन अंधेरों में गुम रोशनी नहीं टिमटिमाती है | |
लाज बिक गयी अब   बाजार नहीं    लजाती है |
टूटे घरों की ख्वाहिशें ये ग़ज़ल क्यों सजाती है | |
दिन के अँधेरों को सारी रात जगकर काटी है |
सुबह हो गयी मग़र      रात   अभी   बाक़ी है | |
@ अनिल कुमार शर्मा
07/05/2017


Saturday, 22 April 2017

The Stolen Earth
The dream and reality
The life and facility
In this post-truth world
Problems are larger than life
Production of abundance
Crowd of redundant
Shifting abode day and night
Life-full dream dry off life
Left is seldom right
But right is always right
Pink-collar is so grudge
In search of a dark delight
I think a lot for nothing
Measuring every nook and cranny
My efforts are ten a penny
Where I live and where I shelter
It is all business and policy matter
God sets the destiny and man plans
Rise and fall of so many civilizations
O man! what is your goal and destiny
Where do you strive to go
This earth is divided in lands and peoples
Full habitat of friends and enemies
What we produce results in garbage
Room of  idea and cage of knowledge
I proceed in time in the mess of hedge
I am born in a map of race and nationality
I am an animal man human and agility
This is land without soil sound without language
There is fight for heaven ground of carnage
So many grounds and ground of dearth
Heaven fed man lives on the stolen earth.
Anil Kumar Sharma
22/04/2017













Saturday, 15 April 2017

अब छोटे जहर को बड़ा जहर खा गया है
लगता है कोई नया कहर आ गया है
मेरी उम्मीद पनपती है कोमल दूब की तरह
कुचल दी जाती है बासी ऊब की तरह
अब तो बहस में ऊँची आवाजें है
बहुत से बंद दरवाजे है
जाने क्यों हर बार मेरी आवाज
आवाजों के धोखे में दब जाती है
मेरी उम्मीद से हट कर
किसी और की उम्मीद सज जाती है
हाशिये की बात कर वो केंद्र में आ जाते है
हाशिये को हाशिये की ओर और टरकाते हैं
मुद्दा वही है और मसला भी वही है
गलत भी वही है और सही भी वही है
बस भाषा बदलती है
किसी की  दाल गलती है
सिर्फ उम्मीद जलती है
अनिल कुमार शर्मा
१५/०४/२००१७


Tuesday, 11 April 2017

मित्र सुधार इतना होता है
किन्तु हम सुधरते नहीं है
और सुधार के धंधे भी
कभी उबरते नहीं है
जब से  बना है संविधान
संशोधन में ही  फँसा है
बिकाऊ न्याय के  बाहर
हम बेचारों का हाथ कसा है
अब तो मुझे हर जगह जाने क्यों
दुकान ही दुकान नज़र आती है
यह व्यवस्था क्यों नहीं शर्माती है ?
लगता है संसद निजी क्षेत्र में है
सिर्फ धोखा ही हमारे नेत्र में है
यह विकास किसका है
और किसके लिए है
पूछ लो उनसे
जिनके बुझ गए दीये है
वो तो अँधेरा फैलाकर
बिजली और बल्ब बेचते है
विकास के कचरे बिखेर कर
शुद्ध हवा और जल बेचते हैं
वो अपना  एजेंट चुनवाते हैं
हम जनप्रतिनिधि चुनते है
एक धोखे की चादर बुनते है
जिसे ओढ़ते -बिछाते हुए
हम लोग प्रवचन सुनते है
अब तो कई ब्रांडो के भगवान दीखते हैं
बाजार में मठों के नाम बिकते हैं
योग के बाजार में बेचता नून तेल धनिया है
योगी भी बन गया बनिया है
योग  का नचनिया है
आस्था का  बाज़ारीकरण है
पतंजलि का पंसारीकरण है
अब तो संतों के नाम पर
जूते के दुकान खुलते हैं
हमारी बुनियाद में कितने
अफवाहों  बुलबुले घुलते हैं
पुरानी गन्दगी को हम
नयी गन्दगी से धुलते हैं
इसी तरह के राह से हम गुजरते है
कुछ बिगड़ते है कुछ सुधरते हैं
इसी तरह सुधार के धंधे चलते हैं
जिसमे भ्रष्टाचार पलते है
हर बार किसी न किसी
बाज़ीगर के बनाये सांचे में ढलते है
सड़ती हुई व्यवस्था में गलते हैं |
अनिल कुमार शर्मा
11/04/2017







Sunday, 9 April 2017

         युवा -दर्द 
बचपन की कोमल पंखुरिया
किशोर मन के सपने
यौवन की दहलीज पर
यथार्थ से टकराते हुए
प्रेम की प्यास
जिंदगी उदास
सम्बन्धो के बोझ तले
दबा घर काटता है
कर्कश संवेदना में
निकम्मी दिशाहीनता को
घृणा भरा प्यार डांटता है
रोटी  पर यूँ ही  हक़ नहीं
रोज़ी की भी उम्मीद नहीं
विकास के झुनझुने बज रहे है
दोस्त किसके सपने सज रहे है ?
ये कौन सी दुनिया रच रहे हैं ?
जहाँ सपने उस तरह सच नहीं होते
जिस तरह देखने के हम आदी हैं
लम्पट व्यवस्था में बर्बादी है
इस रंगीन दुनिया के रंग फीके है
धोखे और भ्रम के कितने तरीके हैं
अब तो अस्तित्व के जीवंत पक्ष भी
समाज के दायरे  से कतराते है
उम्मीद की राह  देखते नेत्र पथराते हैं
अँधेरे दौर में काम की तलाश है
जिंदगी तो अब जिन्दा लाश है
जिसे वैश्विक गिद्ध नोच रहा है
नया दौर खसोट रहा है
सपनों के बाजार में उड़ रहा
टूटे हुए सपनों का गर्द है
 आज के युवा का यही दर्द है |
अनिल कुमार शर्मा
०९/०४/२०१७







Sunday, 26 March 2017

कहते है वक्त भी करवट लेता है
कभी घूरे के दिन भी फिरते है
लोग पके आम की तरह गिरते हैं
काले बादल भी घिरते है
कभी -कभी समय चोट देता है
और वक्त हिसाब भी लेता है
पाँव तले ज़मीन खिसकती है
जिंदगी गुमनाम सिसकती है
वक्त के मार खाये हमसफ़र
इस वक्त से फरियाद न कर
याद रखना कभी कभी वक्त
यूँ ही मुट्ठी में आ जाता है
वक्त के जख्म को खा जाता है
वक्त तो कभी  घाव भर देता है
और कोई जख्म हरा कर देता है
दोस्त यह वक्त हमारा है
जिसे नींद में हमने मारा है
अब वक्त आ गया है जागने का
लंबी नींद त्यागने का
रोशनी के धोखे में
हमने वक्त गँवाया  है
हर वक्त धोखा खाया है
एक चोट को दूसरे चोट से
नमक मिर्च लगाकर सहलाया है
एक भ्रम में खुद को फुसलाया है
अपना और तुम्हारा वक्त खाया है
दोस्त अब हम ज़मीन पर उतर जाये
ज़मीन को पहले ज़मीन बनायें  ।
अनिल कुमार शर्मा
26/03/2017



Saturday, 25 March 2017

 कितना खलता है कुछ होते होते रह जाना
किसी बुनियाद का बनते बनते ढह  जाना
खूबसूरत ईमारत के सपनों का बह जाना
कई बार मैं भी होते होते रह जाता हूँ
चेहरों  की बाढ़ में गुमनाम बह  जाता हूँ
एक चेहरे से दूसरे चेहरे में ढलता हूँ
फौलादी  भ्रम लिए मोम सा पिघलता हूँ
ज़माने का जहरीला  घूँट निगलता हूँ   
आदमी के जिंदगी में इतना जहर क्यों है
आखिर वीरान होता यह शहर क्यों है
अस्तित्व जीने की एक अजीब  मर्यादा है
पूंछ उठा कर देखो तो सबके  सब मादा है
सूत्र में उच्च विचार और जीवन सादा है
व्यवहार में ओढा  विसंगतियों का लबादा है
तर्क तो  बहुत कम विश्वास ज्यादा है
कटोचता है उम्मीदों का धरा का धरा रह जाना
ग़ाज़ीपुर से सिंघासन का गोरखपुर बह जाना
कितना खलता है कुछ होते होते रह जाना
अनिल कुमार शर्मा
२५ /०३/२०१७



 


Sunday, 19 March 2017

जय त्रिदेव है 
आज अपने प्रदेश - सरकार में
ब्रह्मा विष्णु महेश के दरबार में
राष्ट्रीय पुष्प खिल रहा है
राष्ट्रीय पशु दहाड़ रहा है
हनुमान जी की तरह
छप्पन इंच का सीना फाड़ रहा है
अशोक वाटिका  उजाड़ रहा है
सीने में राम और जानकी हैं
कृपा करूणानिधान की है
शपथ संविधान  की है
आदिशक्ति की सवारी है
सिद्ध है  चमत्कारी है
 अब इंतज़ाम सरकारी है
बज रहा राग दरबारी है
जयते सत्यमेव है
जय त्रिदेव हैं
पार्टी भी अघाई है
जनता भी अघाई है
योगी जी बधाई है ।
अनिल कुमार शर्मा
19/03/2017


Saturday, 18 March 2017

बंजर विचारों में कितना पानी दोगे
उकठे दरख्तों में कहाँ से हरियाली दोगे
लाल सियार हुआँ -हुआँ करता है
घंटे -घड़ियाल से डराते हुए डरता है
जंगल की घास लाल दांतों से चरता है
मरती हुई व्यवस्था में मरता है
जिंदगी के सपने दिखाने में
मौत का जाल बिछाने में
हक़ीक़त को यूँ ही भुलाने में
विचारधारा को भुनाने में
टुकड़े - टुकड़े होता है
अपनी अस्मिता खोता है
अपने जेहन में सवाल अब भी उठता है
रोशनी के छलावे में कौन किसको लुटता है
रास्ते भी हैं और ठोकर भी हैं
हँसते हुए भी है और रो कर भी हैं
यह दुनिया आदमी की गढ़ी हुई जाल है
समृद्धि देखते हुए हो रही कंगाल है
क्यों जिंदगी  बन रही इतनी जंजाल है
वे तो हमारी जमीन पर हमारे लिए सपने बोते है
और फसल पकने पर अपने ही हिस्से में काट लेते है
हमारे और अपने बीच में एक फासला बाँट देते है
मैं तो इन फासलों में झूल रहा हूँ
खुद को भुलाते हुए भूल रहा हूँ
वक्त के साथ घुल रहा हूँ ।
अनिल कुमार शर्मा
19/03/2017



Friday, 10 March 2017

 कहते है कमल कीचड़ में खिलता है
किन्तु कीचड़ तो कीचड़ ही रहता है
 सबकी अपनी -अपनी नियत है
किसी की चाँदी तो किसी की फजीहत है
कमल खिलने के लिए कीचड़ जरुरी है
किन्तु कीचड़ के लिए कमल नहीं जरुरी  है
यह बात कितनी गलत कितनी सही है
दीवार किसके पक्ष में कितनी ढही है
 अब तो   इन दीवारों की परिभाषायें
खिड़कियों और दरवाजों के हिसाब से होती है
अब जरुरी कौन है  कितना किसके  लिए
 यहाँ ख़बरों की  बिकाऊ बाजार तय करती है
बुद्धि का होना बुद्धू को ढोना बुद्धिभ्रम बोना
मलाई चाप खा कर फेंक देना ख़बरों का दोना
ख़बरों के घूरे पर ख़बरों के भूखे चौकते है
 जैसे सड़ी  लाश पर लपलपाते कुत्ते भौकते है
 कुत्तों के मालिक आरामकुर्सी से देखते हैं
एक दो टुकड़ा रोटी के वहीँ से  फेंकते हैं
कुत्ता अपनी दमदार  दुम हिलाता है
कीचड़ में कमल का फूल खिलाता है
मालिक उसको भैस का  दूध पिलाता है
भैस तो कीचड़ में पूंछ पटक कर लोटती है
यह  शातिरबाज़ी  किसको पोटती है ?
अनिल कुमार शर्मा
१०/०३/२०१७






Wednesday, 8 March 2017

अंतरराष्ट्रीय नारी सशक्त है
राष्ट्रीय नारी कृष्ण भक्त है
क्या कहें घरेलू नारी अशक्त है
 नारी माँ है बहन है बेटी है
प्रेमिका है पत्नी है
दादी है चाची है
बुआ है मामी है
साली है भाभी है
सरहज है भावज है
इज़्ज़त है लोक -लाज है
हर रिश्ते  की बुनियाद है
देवी है जननी है
उसी से दुनिया बननी है
घर में घरनी है
परिवार की तरनी है
वह समाज को देखती है
और उसे समाज भी देखता है
बाजार का तर्क उसे सशक्त बनाता
और एक मादा  का  शरीर भुनाता है
वह रुपहले परदे पर ठुमकते हुए
 चप्पल से लेकर जहाज़ बेचती है
अब नए चश्मे से हर राज देखती है
ज़माने को कितना नाराज़ देखती है
महाआख्यान में विचार बन्द है
सब स्वतंत्र हैं स्वच्छंद  हैं
कितना फ़ैल रहा दुर्गन्ध है
अब तो घर बनाने में घर टूटता है
कौन यह संस्कार लूटता है ?
अब रिश्तों के महल से भाग कर
वह सड़क पर आती है
महिला दिवस मनाती है
बर्गर और पिज़्ज़ा खाती है
बहुत सशक्त हो जाती है
नई ज़ुबान में चिल्लाती है
स्त्रीवाद का झंडा उड़ाती है
जय नारीवाद हो जाती है ।
अनिल कुमार शर्मा
08/03/2017






Sunday, 5 March 2017

कटोरा बोलता है
देश जहान की बात खोलता है
जो भूले है उनको और भुला दो
एक मृगमरीचिका दिखा दो
हमारे हाथ का हुनर छीनकर
दूसरे की मशीन लगा दो
पेड़ सहमे हुए है
नदी भी सहमी हुई है
जिंदगी में यह कैसी ग़मी हुई है
उधार की बुनियाद बनी हुई है
जमीन छोड़ते हुए लोग अब
 ज़मीन का क्या क़र्ज़ चुकायेगें
आसमान में लटककर
डिब्बेबंद माल खायेंगे
डिब्बेबंद रोशनी में
कौन सा संसार दिखाएंगे
धूप में सपने दिखाकर
वह तो ऊँछी उड़ानें भरता है
किसकी करतूतों से
यह परिवेश डरता है
हवा बेचकर तंग  द्वार खोलता है
कटोरा बोलता है ।
अनिल कुमार शर्मा
06/03/2017



Friday, 3 March 2017

जनता और नेता के  मौसम में
भाषणों की  फसल तैयार है
मालदार  खिलाफ मालदार है
भाई साहब आपका क्या विचार है ?
समझ में नहीं आता कि
मैं नागरिक हूँ या मुद्दा हूँ
न घर का न घाट का
सिर्फ धोबी का कुत्ता हूँ
अब बहारें इस कदर आयीं  हैं
आगे कुआँ तो पीछे खाई है
यह कौन सी अँगड़ाई है
कौन काट रहा मलाई है ?
जनता जनार्दन में जाति का वर्द्धन है
 किसके फंदे में फँसी किसकी  गर्दन है
अँधेरे में रोशनी की बात सुनाई देती है
किन्तु एक ढिबरी भी नहीं दिखाई देती है
पालिशदार जबान से निकलते हुए रंगीन शब्द
मेरे घायल कान में बज़बज़ाते हैं
पाले बदलकर वे सपने दिखाते हैं
किन्तु हक़ीक़त कुछ और है
भाई साहब यह कौन सा दौर है ?
अनिल कुमार शर्मा
03/03/2017

Wednesday, 1 March 2017

 उसकी  संवेदनाओं से ज्यादा
उसके संवेदनामय शब्द बोलते है
किसी बकबक प्रेम की तरह
जो किया तो  कम किन्तु
दिखाया ज्यादा जाता है
कौन खोता कौन पाता है
उम्र के रासायनिक परिवर्तन में
हृदय में उठती  तरंगमालायें
क्यों विवश करती है मुझे
सिर्फ तुम्हारे लिए अचेतन में
कोई अंकुर फूटने लगता है
भावना की उर्वर भूमि पर
जीवन का  ऊर्जा प्रवाह
स्वप्निल आकर्षण में आबद्ध होकर
क्यों सिर्फ तुझे ही निहारता है
तुम्हारा ही स्वरुप निखारता है
स्वयं को खोने पर
तुझे पाने का अस्तित्व हूँ
एक अधूरा व्यक्तित्व हूँ
पूर्णता की तलाश में
सिर्फ तुझे ही ढूंढता हूँ
मन की बेचैनियाँ
हृदय की धङकन
दिवा स्वप्न में खो जाना
सिर्फ प्रेम का अस्तित्व हो जाना
मुक्ति का द्वार खटखटाना
किसी आनंद में छटपटाना
तुम्हारे अस्तित्व में स्वयं को पाना
प्रियतम के प्रेम में नहाना
जीवन का सार्थक हो जाना
प्रेम दे कर प्रेम पाना
क्या ज़माने में सम्भव है
ऐसा हो जाना ?
अनिल कुमार शर्मा
०१/०३/२०१७



Sunday, 12 February 2017

वह अपनी भाषा में बोलता है
मैं अपनी भाषा में सुनता हूँ
शब्दों की प्रतीति ऐसी है
विभिन्न अर्थों को  गुनता हूँ
 अर्थ और आशय की दूरी
अपनी स्थितियों की मजबूरी
भाषायी पाखंडों की धुरी
लपलपाती जीभ से
गिरते हुए नमकीन शब्द
मिठास के आभास में
गुमसुम और निःशब्द
 क्यों  ज़मीन की बात खोती है
ज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखना
हवा में खड़े होकर हवा को फेंकना
आखिर बुनियाद कहाँ पर है ?
अब तो भरोसे का तेवर
विश्वास को छलता है
सत्याभास गढ़ते हुए
झूठ में पलता है
यह जमाना
किस आग में जलता है ?
अनिल कुमार शर्मा
१३/०३/२०१७







Sunday, 22 January 2017

एक कहानी सी  छलक आती है
तुम्हारे उद्द्बुद्ध चेहरे से
गुलाबी होठों  पर गुनगुनाती सी
कपोल कोमल पन्नों की तरह खुलते है
अलकों के झिलमिलाते  हर्फ़ मिलते हैं
दीप्त नयनों से निकलते अंशु
प्रभात के आलोक में आह्लादित
कुसुमित कली पर तुहिन बिंदु से
तप्त हृदय को शीतल करते हुए
नव जीवन का जैसे विहान होता है
सौन्दर्य में खिला जगत -जहान होता है
उम्र का वह सुन्दर पड़ाव
छबि के आलोक से समृद्ध
प्रकृति की सम्पूर्ण आकर्षण को समेटे हुए
कितने कथाओं में आवृत है
सत्यवती शकुन्तला उर्वशी मेनका
अनंग और शिव का तीसरा नेत्र
अर्द्धनारीश्वर की परिणीत में
कथा का काव्य लय
रागमय ध्वनित छंद
वही है कालातीत द्वन्द ।
अनिल कुमार शर्मा
22/01/2017