Sunday, 25 June 2017

                                                  कंगाल होता जनतंत्र : एक आकलन 
                                                                                लेखक - गंगाधर "सुमन"
                                                                   पूर्व प्रवक्ता (अंग्रेजी ), खालिसपुर इण्टर कॉलेज ,ग़ाज़ीपुर
                                                                                वरिष्ठ कवि एवं समीक्षक
             युवा कवि अनिल कुमार शर्मा का प्रथम काव्य संग्रह 'कंगाल होता जनतंत्र '  मुझे दिनांक २१-०४-२०१५ को श्री शर्मा द्वारा सस्नेह  प्राप्त हुआ | संजोग था एक उद्घाटन समारोह  जहाँ मैं गया था | कवि अनिल कुमार शर्मा भी वही थे | परस्पर परिचय डॉ पी ० एन ० सिंह ने कराया | वैसे श्री शर्मा की प्रखर प्रतिभा  के बारे में   मैं   एक मित्र से पहले भी सुना था | सम्भवतः  यह संग्रह लगभग बीस वर्षों का प्रयास है | इस संग्रह में कुल पचहत्तर रचनाएं हैं | इनके भाव, कोण  और त्वरा अलग-अलग हैं|  विज्ञानं ,राजनीति ,व्यवस्था , धर्म ,समाज और जीवन को स्पर्श करती विकृतियों पर कवि  ने   पुरजोर  लेखनी चलायी है , जिसको उसने अपने जीवन में चारो  ओर भोगा और झेला है | इन कविताओं से व्यंग के साथ -साथ कवि का आक्रोश भी साफ प्रकट होता है | संग्रह के प्रथम (कवर ) पृष्ट के पीछे   कवि  ने  इस संग्रह को लिखने का मंतव्य भी स्पष्ट किया है |
                                           भावनाओं में भावनाएं फँसती है,
                                           चीखती हैं ,रोती हैं , हँसती हैं ,
                                           संवेदनाएं शब्दों में कसती हैं |
          आगे बढ़ने पर 'दो शब्द' मिलता  है | कवि कहता है - भावनाओं की छटपटाहट को शब्दबद्ध करने का प्रयास मेरी कविता है | आगे कवि फिर कहता है - ' इस संकलन में सामान्यतः मैंने सामाजिक विसंगतियों को व्यंग काव्य   के रूप में  अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है | लगभग सत्रह पृष्ट की भूमिका में  पूरे काव्य संग्रह का परिचय दिया गया है | संग्रह की अधिक कविताओं से उद्धरण भी प्रस्तुत है | डॉ पी ० एन ० सिंह ने कवि शर्मा को विलियम  वर्ड्सवर्थ के बहुत नजदीक बताया है , क्योंकि संग्रह की कवितायेँ छंद विधान और व्याकरण पाश से मुक्त हैं | साथ ही अनिल को बुद्धिजीवी न होकर बुद्धिधर्मी होने का सुझाव भी दिया है और उसका कारण भी बताया है | संग्रह की भूमिका और 'दो शब्द' को  पढ़ने के बाद , मैंने संग्रह की सभी कविताओं को पढ़ कर यह जानने का प्रयास किया कि वास्तव में  कवि और भूमिका लेखक ने जो कहा है , वही भाव ,अर्थ या व्यंग इन कविताओं में सृजित होता है |
          संग्रह की रचनाओं में समाज की विद्रूपता और   उसके  बीच खड़ा आदमी अपने रिश्तों को सम्हालता शून्य में स्तब्ध खड़ा दीखता है | महंगाई ,भ्रष्टाचार और अनैतिकता की चक्की में पिसता निम्न और मध्यवर्ग तथा आदमी से आदमी के टूटते सम्बंधों के दर्द को युवा कवि ने बड़ी संजीदगी से अपनी कविताओं में उभारा है, इससे रचनाओं का व्यंग बहुत प्रभावशाली और दो- टूक होता गया है | कहीं -कहीं तो व्यंग की त्वरा काफी  तीक्ष्ण है | जीवन में रोजमर्रा की विसंगतियों पर किये गए प्रहार बहुत संवेदनशील और कटु हो गए हैं | व्यवस्था की विसंगतियों पर कवि का प्रहार जिंदगी के उन लमहों तक असर डालता है जो कुछ बनने ,रचने और धीरज तक तनहा ,एकदम तनहा खामोश हो जाते हैं | कुछ कविताओं से मुझे स्पेनिश लेखक गाबिरियल मार्सिया मार्कल की पुस्तक ' वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सालिंटयुड ' की याद ताज़ा हो जाती है , जहाँ उसने समाज में बढ़ती  विसंगतियों के बदरूप चेहरे पर बार -बार चोट  किया है | कवि शर्मा की कुल मिलाकर यही उपलब्धि है | लगता है कवि कुछ खोज रहा है , लेकिन चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है | कवि समय ,समाज,और परिवेश से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहता है | इसलिए वह मन की  आँखों से भीतर और बाहर झाँकता है और इसी से  जीवन की विवशताओं और सीमाओं को परिभाषित करना चाहता है | वैसे यह काव्य यात्रा इन विवशताओं और सीमाओं का अतिक्रमण करके कहीं -कहीं आगे भी निकल गई है |
          संग्रह की कई कवितायेँ जीवन को अर्थ देती हैं और सामाजिक कुरीतियों ,रहस्यों और विद्रूपताओं का परदा  भी उठाती चलती हैं | कवि अपने समय के माध्यम से अपने को पहचानने की कोशिश करता है ,  जिससे जाने -अनजाने कविताओं को नये  आयाम और नये अर्थ मिलते गए हैं | इससे कवि की पीड़ा और द्वन्द को समझना सरल हो गया है | यहाँ एक प्रश्न भी खड़ा होता है कि जब दुःख ही जीवन की कथा है तो प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ? इन कविताओं से आभास होता है कि कवि शर्मा को परिवर्तन और अमन की तलाश है ,  वही परिवर्तन जो सृष्टि का अटल नियम है | संग्रह की कवितायेँ काव्यगत एक सिस्टम के साथ जुडी रहकर  बदलाव के नये आयामों का उद्घाटन करती हैं | भूमिका में उद्धृत कुछ कवितायेँ इसका उदहारण हैं | इससे यह भी ज्ञात होता है कवि  जिज्ञासु है और  जिज्ञासा सदैव समय ,समाज और व्यवस्था से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहती है | इस संग्रह की कविताओं का यही मर्म है | निर्भेद कवि अपने मन्तव्य में बहुत सफल है और उसकी रचनाधर्मिता सराहनीय और सार्थक है | कवि की इसी सोच से शब्दों का भाव और विचारों में आना -जाना एक कविता हो जाता है | कवि भी स्वयं कहता है - बुद्धि ,भाव और शब्द अकेले कविता नहीं हो सकते |
                                      शब्दों की सीमा से पार हो
                                      कविता तुम अलग संसार हो
संग्रह के आने में एक लम्बा समय लगा है | वय के अलग -अलग स्तर पर लिखी गयी ये कवितायेँ अल्पवय और प्रौढ़वय की रचना क्षमता का प्रतिमान हैं | फिर भी अपने भाव और अर्थ में सभी अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी हैं | महान जर्मन लेखक गुंटर ग्रास का मानना है कि ईमानदारी से किये गए कार्य को पहचान जरूर मिलती है | ग्रास का मानना था कि अभ्व्यक्ति का पैमाना भावनाएं होती हैं , राजनितिक समीकरण नहीं | उनका स्पष्ट कथन है कि साहित्य को पूर्वाग्रह के पैमाने से मापना साहित्य की गुणवत्ता से समझौता करना है | कवि ने धर्म , राजनीति  , विज्ञानं , साहित्य , गणित , पाखंड , वर्ण ,वर्ग और व्यवस्था की कलई खोला है | इस संग्रह की किसी भी कविता पर अंगुली उठाना उस कविता के भावबोध और सत्यता पर पर्दा डालना या कवि की भावनाओं को हतोत्साहित करना है | वक्ररेखा , शून्यवाद, खुदा के खेत में , सुनो किसानों , भ्रष्टाचार जी , भगत सिंह तुम्हारे बमों का इंतज़ार है , रियलिटी शो का सौंदर्यशास्त्र  जैसी कई अन्य रचनाएँ हैं जो सबको कुछ सोचने के लिए झकझोरती हैं | संग्रह की कविताओं के भिन्न -भिन्न विषय , तद्-रूप    भाव संयोजन और तद्नुसार शब्द -चयन , प्रभाव और प्रवाह कवि की रचना कला और क्षमता को एक ठोस आधार प्रदान करती है | डायरिच वॉन होपर कहता है कि प्रेरणादायी दमदार रचना की परीक्षा यही है कि वह नयी पीढ़ी के लिए किस तरह की दुनिया रचती है | संग्रह की कुछ कविताओं , जैसे - फूल नहीं, कांटे नहीं, यह सोचकर मैं सोचता हूँ कि क्या सोचूँ , ऐ अजीब जिंदगी ये क्या देखता हूँ ,से ग़ज़ल की सुगंध और नए प्रयोग का आनंद मिलता है | कविता " मृत जीवन" में काव्यगत स्थापित परम्परा और प्रतिमान को बहुत सम्भल  कर अपनाते हुए सधे व्यंग की चुभन की सुन्दर प्रस्तुति है |
              आज उदारीकरण , ग्लोबलाइजेशन , बाज़ारीकरण की खूब चर्चा है | आरक्षण का कोढ़ इन पैंसठ वर्षों में विवाद का केंद्र बना हुआ है | जनतांत्रिक भारत का संविधान कितना बेचारा बना हुआ है | विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका की क्या दुर्दशा है , कवि ने सबको गहराई से समझा है और इनकी स्थिति को परत दर परत उधेड़ कर रख दिया है | सामाजिक मूल्यों के क्षरण और सांस्कृतिक विडम्बना पर अनेक कवितायेँ हैं , यह कवि की पीड़ा  और उसके भाव -विन्दु को समझने के लिए काफी हैं | कवि जानता है कि  आज आदमी एक अफवाह मात्र है | इसलिए कवि की बहुविध चिंतन से सहमति -असहमति भले हो , लेकिन उसकी रचना क्षमता की सत्यता से इंकार  नहीं किया जा सकता | एक कवि की कुछ पंक्तियाँ इस सन्दर्भ में पठनीय हैं -
                                          एक आदमी में सिर्फ एक आदमी ही नहीं
                                         कई आदमी रहते हैं , अलग-अलग रिश्तों में |
             डायरिच वॉन होपर कहता है - आदर्श रचना की सही परीक्षा यही है कि वह नयी पीढ़ी के लिए किस प्रकार  की दुनिया रचती है और क्या सन्देश देती है | कविता 67 'भ्रम में जीता मैं कवि हूँ ' तक आते ही कवि का व्यंग  पूरे  यौवन पर आ जाता है | आज के कवि , लेखकों और समीक्षकों की सोच और रचना का क्या स्तर है - पंक्तियाँ देखें |
                                          अब तो लगता है मुझे
                                          कि कवि हो गया हूँ
                                          किसी कबाड़ में खो गया हूँ |
समीक्षकों की स्थिति की झलक -
                                         खेमे के ऊपर खेमा धरता नामवर है |
कवि ऐसे सारे छद्म ,गुटबाज -मठाधीशों की पोल खोलते हुए कहता है कि आज सभी जय शंकार प्रसाद , सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला ' ,दिनकर, गुप्त और धूमिल हो गए हैं | दस-बीस लोगों का खेमा या भीड़ बटोरकर साहित्य रचना का जो ढोंग किया जा रहा है , कवि उनके भ्रम  को प्रतीकों से स्पष्ट करता है | इस संग्रह की कविताओं में तीखा ,कड़वा या निर्भीक व्यंग वास्तव में छद्म -स्थापनाओं का पर्दाफाश करता है जो अनायास कुछ न होकर भी अपनी मिथ्या गुरुता की डींग मारते हैं | संग्रह की सभी कवितायेँ कविता के समस्त प्रतिबंधों जैसे  शैली ,व्याकरण ,विधान और मीटर से मुक्त कवि की स्वतंत्र और मनचाही अभिव्यक्तियाँ हैं | कवि जो कह रहा है क्या वह सत्य के निकट नहीं है ? कमीज़ की दो जेबों में दायी वाली आज भी भरी और मान्यताप्राप्त है और मूलतः वही साहित्यिक सीमाओं में सर्वोपरि है और बायीं जेब लाख उछल -कूद के बाद भी खाली है | तर्क ,जिद्द ,ज्ञान -नाम के भरोसे चाहे जो कहा जाय , सच्चाई को हठात नकारना आसान नहीं है | हिंदी साहित्य का इतिहास इसका साक्षात् प्रमाण है | कलम की गोलबंदी से स्वस्थ्य साहित्य और गंभीर चिंतन का प्रभावित और उदास होना स्वाभाविक है | तुलसीदास का समन्वयवादी स्वर और कबीरदास का पाखण्ड आलोचक स्वर का आधार अध्यात्मिक ही है | दोनों ने समाज को उत्तम सीख और सही दिशा दिखाया है | फिर किस मूल स्वर को पकड़ने का प्रयास ' दूसरी परम्परा की खोज ' है ? क्या - चश्में की नज़र पर / नाक की ऊंचाई हावी है / क्या इसके इर्द -गिर्द सिंह और पूँछ'  नहीं है ? क्या आज की आलोचना ' सात अंधों का हाथी का वर्णन' नहीं है ?-- ' यह आदमी कलम की गोलबंदी करता है /  एक  कलमधारी से दूसरे कलमधारी पर वार करता है / एक बार नहीं हर बार करता है /   . . . . . . . . . . . . . .  ' उसकी चारण चिट्ठियाँ राष्ट्र की धरोहर हैं / उसका अंगूठा छाप भी किसी की सफलता का मोहर है /' ये पंक्तियाँ क्या कहती हैं ?
              अंत में मैं अपना आकलन  कवि की अंतिम कविता  ' यही परिवर्तन है ' को उद्घृत कर , लेख की लम्बाई को देखते हुए समाप्त करना चाहता हूँ |
                                       ' एक महापुरुष अपनी आँखों को बंद किये
                                         मधुर स्वर में
                                        मेरी नंगी आँखों का सच
                                        परिकल्पनाओं और विचारों में लपेटकर
                                       कई खिड़कियों - दरवाजे वाले 
                                      कई मंजिली सिद्धांतों की सीढी पर
                                       चढ़ा रहे थे , उतार रहे थे
                                      सत्य के स्वरुप को चाक़ू -कैंची
                                       बसूले से सुधार रहे थे
                                      उनका सत्य शिव था, सुन्दर था
                                      जो सत्य मैंने देखा था
                                      उससे बेहतर सत्य उनकी आँखों के  अन्दर था |
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