Wednesday, 21 June 2017

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इस फीके शहर में कुछ चमक आयी है
एक बरसने वाली घटा छायी है
यह शहर बहुत दिनों तक लाल रहा
क्रांति के सपनों में कंगाल रहा
किस्मत में फटेहाल रहा
इस बंजर में एक फूल खिला है
वैसे तो यह क्रांतिकारियों का जिला है
न तो किसी से शिकवा है
न ही किसी से  गिला है
अफीम फैक्टरी का भोंपू जगाता है
गंगा जी  का भी कुछ नाता है
 पिछड़ेपन का बही -खाता है
इसकी दास्तान  खूब है
एक अजीब सी ऊब है
न प्राचीर है न कपाट है
इसका चेहरा सपाट है
फिर भी गुलाबी महक है
अफीमी बहक है
यह शहर विचित्र है
धूल  छिड़कता इत्र है
अब इस बेनाम शहर में जाम लगने लगा
मतलब साफ है  विकास दिखने लगा
इस फीके शहर में कुछ चमक आयी है
एक बरसने वाली घटा छायी है |
अनिल कुमार शर्मा
२१/०६/२०१७




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