Wednesday, 28 June 2017

मैं कहूँगा मित्र
तुम्हारे कान के पर्दे फटने तक
अपनी आवाज़ के तेवर में
दास्तान उनकी
जहाँ रोज़ ज़िंदगियाँ मरती हैं
रंगीनी में संवेदनहीन सत्ताएं चरती हैं
बीज की विरासत ढ़ोती ये उर्वरताएँ
कठिन समय को बोती हैं
चूल्हा बुझा गायब रोटी है
ज़मीन से उठकर आसमान पर जाना
आसमान के दायरे से ज़मीन को देखना
ज़मीन पर कुछ आसमानी टुकड़े फेंकना
आखिर यह कब तक चलेगा ?
धरती का कलेजा कब तक जलेगा ?
ज़मीन चबाते लोग ये
कुछ हवाई ज़मीन गढ़ते हैं
हवा बनाकर उसी हवा में उड़ते हैं
अब तो हवाओं की दुकान सज रही है
ज़मीन पर हवाई राग बज रही है
अब तो जंगल भी भयभीत है
नदी -नाले हो रहे अतीत है
पहाड़ गलने लगा
परिवेश जलने लगा
हवा ज़हर बनने लगा
जिसका पानी मर चुका
वह पानी बेच रहा है
बुड्ढों की जवानी बेच रहा है
धुन्ध में ढकेलती कहानी बेच रहा है
हमारी ज़मीन छीन कर
बुलबुले आसमानी बेच रहा है |
-------------अनिल कुमार शर्मा
                  26/06/2017





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