Sunday, 7 May 2017

                                     ग़ज़ल
सुबह   हो गयी    मग़र     रात     अभी  बाक़ी है |
इस रोशनी में अब कोई साज़िश झिलमिलाती है | |
सूरज     बहकता     सा   चाँदनी   मुस्कुराती है |
हवा का रुख बताने में पत्तियां लड़खड़ाती हैं | |
धुँवा इस कदर  पसरा        आंखें डबडबाती हैं |
दीया बुझा -बुझा सा  जली -जली सी बाती है | |
इस तरह सजी ज़िन्दगी जिन्दगी को ऊबाती है |
रंगीन अंधेरों में गुम रोशनी नहीं टिमटिमाती है | |
लाज बिक गयी अब   बाजार नहीं    लजाती है |
टूटे घरों की ख्वाहिशें ये ग़ज़ल क्यों सजाती है | |
दिन के अँधेरों को सारी रात जगकर काटी है |
सुबह हो गयी मग़र      रात   अभी   बाक़ी है | |
@ अनिल कुमार शर्मा
07/05/2017


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