Sunday, 7 May 2017

वह तोड़ता भूत
जोड़ता भविष्य
फोड़ता वर्तमान
जिसे मैंने देखा
कचहरी के पथ पर
चीथड़ों के साम्राज्य पर
गर्दिश में खोयी किस्मत के बीच
पिजड़े में बैठा तोता
किसी  का भाग्य विधाता होता
गत्ते के ढ़ेर में उलझे हुए भाग्य लेख
उलझती हुई जिंदगी को देख
समाधान के पक्ष विपक्ष
कर देते किंकर्तव्यविमूढ़
ग्रह - नक्षत्रों के चक्रव्यूह में फंसा जीव
शायद ही कोई निजात पाता है
तोता पिजड़े से बाहर आता है
भाग्य के लेख को चोंच से उठाता है
भविष्यदर्शी उसे बाँचता है
स्लेट पर आड़ी -तिरछी रेखाएं खांचता है
अंगुली पर कुछ गिनता है
दो चार अंगूठी बीनता है
राहु केतू शनि को भगाता है
बजरंगबली को जगाता है
किस्मत के बाद बची कचहरी है
सबूत और गवाही में बुद्धि हरी है
अब तो घुन पिसता है
बच जाता जौ साबूत
वह तोड़ता भूत |
@ अनिल कुमार शर्मा
हास्य दिवस पर अप्रेम
07/04/2017



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