Tuesday, 4 July 2017

परेशान आदमी 
परेशान होने वाला आदमी
परेशान करनेवाला आदमी
परेशानी हटानेवाला आदमी
सब परेशान हैं
दोषारोपण आसान है
जिस तरह जो है
और जिस तरह उसे होना चाहिए
सवाल यह है  कि क्यों होना चाहिए ?
अस्तित्व कठिन है
और अस्तित्व आसान भी है
जो है उससे ज्यादा उस पर आरोपित है
क्रोध कम  क्रोधबोध ही ज्यादा कुपित है
पहाड़ पर मैं हूँ
या पहाड़ मुझ पर है
नदी के किनारे मैं हूँ
या नदी मेरे किनारे पर है
दिन और रात मेरे लिए है
या दिन और रात की नियत में मैं हूँ
सूरज डूबता है और उगता है मेरे लिए
अँधेरे और उजाले में क्यों कोई अर्थ  ढूंढता हूँ
अस्तित्व का खोल ओढ़े क्यों अस्तित्व पर कुढ़ता हूँ
क्यों हवा में जहर घोलता हूँ
परिधि की खोज परिधि से बाहर नहीं जाती
पदार्थ पर प्रत्यय की धारणा बनाती
उगे हुए प्रश्न को काटता हूँ
पद,पदार्थ और प्रत्यय में बाँटता हूँ
दर्शन के पद चिन्हों को चाटता हूँ
कुछ भूला  नहीं है  फिर भी खोजता हूँ
पूर्णता को खण्ड -विन्यास से बोझता हूँ
न अल्प हूँ न महान हूँ
अर्थ और अनर्थ के मध्य परेशान हूँ |
अनिल कुमार शर्मा
04/07/2017


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