Sunday, 13 August 2017

           कुर्सीवाद
यहाँ न तो  बीज है न खाद है
अब जिंदगियां  सिर्फ बरबाद हैं
सपनों से पहले या सपनों के बाद है
मित्र सिर्फ सत्ता का  कुर्सीवाद है
यहाँ तो सिर्फ घुटन है टूटन है
जिंदगी के सफर का छूटन है
अब तो कोई कली  नहीं खिलती
क़र्ज़ पर भी साँस नहीं मिलती
निवेश के लिए घूमता  नंगा है
शांति के ढोंग में फैलता दंगा है
अब समय कितना हो  गया अजीब
नवजातों को उम्र भी नहीं होती  नसीब
इस विकास के अँधेरे में किधर भटक रहे हैं
स्वर्ग की तलाश में त्रिशंकु जैसे लटक रहे हैं
यह क्या है ? रोशनी है या रोशनी का धोखा है ?
नमक लगे न फिटकिरी और रंग भी  चोखा है
आशा की टहनी पर छा गयी निराशा
गंगा जी की नियत बन  गयी कर्मनाशा
सत्य पर झूठ हो रहा आबाद है
इस दौर में सिर्फ कुर्सीवाद है
जब आदमी कुर्सी में ढलता है
पूँजी के टुकड़ों पर पलता है
कुर्सी की बोली बोलता है
खाली जेब टटोलता है
अपनी संवेदनाओं को मारता है
भीतर के इंसानियत  डकारता है
विषधर की तरह फुँफकारता है
बिच्छु की तरह डंक मारता है
 न सवाल है न जबाब है
उसका सतरंजी अंदाज़ है
अजीब कुर्सीवाद है |
अनिल कुमार शर्मा
13 / 8 /2017





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