किसकी कितनी आजादी है
धोती कुरता खादी है
जय बोलो महात्मा गाँधी है
डंडे में लटका एक झंडा है
उसके ऊपर एक फंदा है
जिससे डोरी लटक रही है
हवाएँ किसको झटक रही हैं
खूनी पंजो में सिसक रही है
आज़ादी क्यों झिझक रही है
जगह है जिनकी कारागारों में
संसद को हथियाये बैठे है
अपने दुर्दम पैरों से
जनमत को लतियाये बैठे है
भूखी जनता के ऊपर तो
उनकी भर रही तिजोरी है
अफसर के ऑफिस में
रोज बढ़ रही घूसखोरी है
सत्ताधारी उन्मादों में
क़ानूनी गहरी माँदों में
विषधर से लहराते है
आज़ादी के झंडे को
तिकड़म से फहराते है
सड़ी हुई नैतिकता में
निरर्थक आदर्श बतियाते है
किसी तरह से कहीं भी
कुर्सी को हथियाते है
अब आदर्श यहाँ पर कुर्सीवादी है
किसकी कितनी आज़ादी है ?
अनिल कुमार शर्मा
15 /8 /2017
धोती कुरता खादी है
जय बोलो महात्मा गाँधी है
डंडे में लटका एक झंडा है
उसके ऊपर एक फंदा है
जिससे डोरी लटक रही है
हवाएँ किसको झटक रही हैं
खूनी पंजो में सिसक रही है
आज़ादी क्यों झिझक रही है
जगह है जिनकी कारागारों में
संसद को हथियाये बैठे है
अपने दुर्दम पैरों से
जनमत को लतियाये बैठे है
भूखी जनता के ऊपर तो
उनकी भर रही तिजोरी है
अफसर के ऑफिस में
रोज बढ़ रही घूसखोरी है
सत्ताधारी उन्मादों में
क़ानूनी गहरी माँदों में
विषधर से लहराते है
आज़ादी के झंडे को
तिकड़म से फहराते है
सड़ी हुई नैतिकता में
निरर्थक आदर्श बतियाते है
किसी तरह से कहीं भी
कुर्सी को हथियाते है
अब आदर्श यहाँ पर कुर्सीवादी है
किसकी कितनी आज़ादी है ?
अनिल कुमार शर्मा
15 /8 /2017
बहुत ही बेहतरीन।
ReplyDeleteये कविता एक दिन लोकतंत्र का आवाज जरूर बनेगा ।
कुर्सी के आगे कुछ नज़र ही नहीं आता
ReplyDeleteबहुत खूब!