Friday, 17 January 2014

आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो
तुम्हारे मुँह में भूसा ठूँसकर
आँख में धूल झोंक कर
जनतंत्र चलाया जा रहा है है
तुम्हारे देखने के लिए
पार्टी के घिसे पहिये का पंचर साटने वाले
विधायक का महल बनाया जा रहा है
देखो समृद्धि दिखायी दे रही है
आरक्षण की आरोही संगीत सुनाई दे रही है
दीन बनो हीन दिखो
आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो
इसी दायरे में संविधान लिखो
स्तनविहीन जननी लोरी सुना रही है
हवा में चम्मच हिला रही है
माहौल में बुलबुले मिला रही है
खाली उम्मीद पर जिला रही है
पानी में लाश फूल रही है
 काँटों से उलझकर जिंदगी वसूल रही है
तत्काल के मोहरे पर  दूर के दाव है
यह एक अनवरत नाव है
जिसे खेना  कुर्सी की मज़बूरी है
यह हवेली सदा अधूरी है
यह इतना गाढ़ा रंग है
जहाँ रास्ता ज्यादा तंग है
नदी सूख रही है
बाँहे भी दूख रही है
सवेरा तराशने वाले
रात में ही जुगाड़ लगाते है
बासी रोटी पर गरम मक्खन लगा कर खाते है
ठण्ढे तवे पर गरम घास की रोटी सेंक रहे है
जातियों में आरक्षण पर आरक्षण फ़ेंक रहे है
दूध के लिए छटपटाते दुधमुहों के लिए
गन्दी कटुता में पानी लिखो
आरक्षण वाली दूधपिल्ली के लिए चीखो ।
             अनिल कुमार शर्मा
               ग़ाज़ीपुर


Wednesday, 15 January 2014

   कॉमरेड का  असर
वो ऐसा गरीब ढूढ़ते है
जो लड़ सकें
और लडने के सिवा न कुछ कर सकें
वो लड़ाते रहें और ये लडते रहें
"तुम्हारे भूख की वजह भरे पेटों की शरारत है "
 यही  समझाते हुए
एक ऎसी दुनिया  गढ़ते हैं
जहाँ संघर्ष के सिवा कुछ नहीं है
कमजोर टूटी पसलियों पर
सिद्धांतों के कफ़न का मरहम लगाते हुए
ये  इंकलाब के नारे बड़े बेचारे बेचारे लगते है
हरे पत्तों को तोड़ कर सुखा दो
और उसमें आग लगा दो
समझ लो सत्ता जहर है
भूखे पेटों के लिए
उसे बंदूक से उड़ा दो
हम नयी सत्ता रेशमी फंदों वाली लायेंगे
जिसमे पकवानों के इस्तेहार होंगे
तुम्हारे मुँह में टपकते लार होंगे
भूख तो महसूस होगी
किन्तु सताएगी नहीं
क्योंकि जहर का डर होगा
यही कॉमरेड का असर होगा
    अनिल कुमार शर्मा  

   कुलगीत के मीत
महामना के    पावन    मन्दिर      में ,
चढ़े     हुए     तुम     ज्ञान     कुसुम ।
सुरभित    होकर     फैल     रहे  हो ,
मधुर   मनोहर    विकसित      तुम ।
शिव -नगरी ,  काशी      की  गरिमा ,
सारनाथ   के       बौद्ध      विहारों में ।
दर्शन ,  कला ,   ललित   विधा    से ,
ज्ञान -विज्ञान ,   संगीत    बहारों में ।
स्मित   उपवन   के   दल प्रफुल्लित ,
परिसर      में     तुम    खिले   रहो ।
महामना   के     पावन     कुल   की ,
स्निग्ध       परम्परा      बने  रहो ।
महाकाय  महामना  के  फैले हम ,
जड़ ,   तना ,   कुसुम ,      पत्ते  है ।
विविध   सुमन    के   मकरंद चुने ,
पर    एक   मधुकोश   के   छत्ते है ।
 सिंघद्वार    का    तोरण  देखकर ,
मुझसे मिलता   निष्छल अतीत ।
होता   वर्त्तमान   छल   सा प्रतीत ,
मैं गूँजता मेरे कुलगीत के मीत । ।
  ------अनिल कुमार शर्मा

Tuesday, 14 January 2014

कॉमरेड तुम बात सही कहते हो
किन्तु उस पर लाल रंग पोत देते हो
यहाँ तक कि मियां बीबी के झगड़े में भी
वर्ग -संघर्ष जोत देते हो
तुम्हारी आँखें पुरानी हैं
और चश्में भी पुराने हैं
यह नया दौर है
नए ज़माने हैं
बुर्जुआ राख है पूँजीपति हरा है
सर्वहारा देता पहरा है
बाज़ार के चकमक में
जगमग जगमग भरा है
शोषित कौन है और शोषक कौन है
यह बताना मुश्किल है खोल में
रजाई कौन है और तोसक कौन है
अब तो मौका मिलने की देर है
मालिक भी  ठगता है
मजदूर भी ठगता है
फिर भी तुमको एक शोषक
और दूसरा शोषित लगता है
अभी तुम उत्पादन और वितरण में भूल रहे हो
सरप्लस वैल्यू में झूल रहे हो
अपनी आइडियोलॉजी में बेहद खुश हो
क्योंकि दिमाग में पाले  एक रूस हो
हर मंदी के बाद अमेरिका ढहता है
हर कॉमरेड यही कहता है
पुंजीवाद बहुत बड़ा धोखा है
मार्क्सवाद चटनी और चोखा है
रोजी -रोटी गायब है
यह तरीका बड़ा नायब है
हिलते रहो हिलाते रहो
पानी मार -मार कर
क्रांति की आग जिलाते रहो
इंकलाब गाते रहो ।
  ---------अनिल कुमार शर्मा
I woe a mirror
Which shows my face as it is
I want to be fit where I never fit
And claim it as my struggle
Light is mine and dark is others'
I blame my fall on brothers
This I expose myself inside
But dare not to come outside
I am covered in these two faces
One what I am indeed and
Other what I want to show
 O my mirror! you are my foe
You show me my tip to toe
With my arrow and bow
And my fickle hands go
In search of my true mine
I dodge myself to me
And made endeavor to flee
But where I go from my me
In this terror
I broke me mirror.


Monday, 13 January 2014


दिल्ली हिली , कुछ आम आदमी में मिली
कुछ पानी मुफ्त है कुछ रियायत में बिजली
घूसखोरों के कुछ कान खड़े है
यही कुछ भ्रष्टाचार की   जड़े है
बात यही है कि अपने  घरों की गन्दगी
रास्ते में   फ़ेंक कर उसपर चलते है
अपने दरवाजे पर फिसलते है
अधिकार की बात पर उछलते है
कर्तव्य की बात पर
पतली गली से सरकते हैं
अब वोट लैपटॉप है ,बिजली है , पानी है
मतदाता याचक , पार्टी दानी है
अब जनतंत्र की यही कहानी है
निरीह आदमी के पास एक वोट  है
सत्ता पर करता चोट है
यह आदमी कभी जनता होता है
तो कभी नेता होता है
कभी लेता होता है
तो कभी देता होता है
कभी दुत्कारा होता है
तो कभी चहेता होता है
कभी सिंहासन पर तो कभी
नंगे सड़क पर लेटा होता है
कभी बाप होता है
तो कभी बेटा होता है
अपने देश की किस्मत क्या कहें
देश वाला देश पर रोता होता है ।
          -----------अनिल कुमार शर्मा
       ग़ाज़ीपुर   



Sunday, 12 January 2014

सवाल चुप, जबाब उदास है
ज़माना बिंदास है
ज़मीन से बरकते हुए
कोई ज़मीन गढ़ रहा है
यह ज़माना एक अजीब
किताब पढ़ रहा है
फ़ुरसत किसे है
पुरानी बात  दोहराने की
हर जगह बिछे बिस्तर मिलते हैं
जरुरत नहीं आशियाँ सजाने की
हर जगह घरों के टुकड़े हैं
रिस्ते टूटे बर्तनों की तरह  बिखरे है
उत्तर -आधुनिकता में इतने निखरे है
कि साबुत कुछ भी नहीं बचा
मूल्यहीन जिंदगी तुम्हारी क्या खता?
संस्कृति की खोल में बंद थी
अब नंगी होकर बाहर आ रही हो
लगता है ग्लोबल होती जा रही हो
अब आदमी काफी उदार है
क्योंकि सामने बाज़ार हैं
सरकार को जिसका इंतजार है ।


            मेरी हिन्दी
मेरी हिन्दी में कुछ हिन्दी वाले हैं
जो अपने कद की खड़ी किये दीवालें हैं
हिंदी बह -बह कर रुक जाती है
इन हिंदी वालों के चंगुल में छटपटाती है
मचा हुआ घोर संग्राम है
इधर भी सिकिया पहलवान है
उधर भी सिकिया पहलवान है
आलोचक बूढ़ा लेखक जवान है
मुँह में चबाता बनारसी पान है
चापलूसी की चटनी, पुरस्कारों की पकौड़ी
पुरस्कृत पुस्तकों के पन्नों पर खायी जाती है
हिंदी में यही तरकीब अपनायी जाती है
लेखक पटाखा है लेखिका फूलझड़ी है
हिंदी इन्हीं कर्णधारों के पल्ले पड़ी है
जैसे राजनीति में जात है
वैसे साहित्य में कई पाँत है
जो हिंदी में जन्मजात है
कोई छींकता है तो उसमें हिंदी है
चिल्लाता है गुर्राता है
जगह -जगह से विचार चुराता है
कई जीभों में लपेटकर
मेरी हिंदी में अपना बताता है
क्योंकि हिंदी हिंदी से बाहर नहीं जातीहै
इन्ही बंद कोठरियों में छटपटाती है
जिस पर लटका हुआ बहुत बड़ा ताला है
मेरी हिंदी में विचित्र हिन्दीवाला है
चाभी उसके पास है
उसे इतना विश्वास है
कि हिंदी उसकी है
बजता चुटकी है
आवाज हिंदी हो जाती है
यही लिखी जाती है
यही पढ़ी जाती है
मेरी हिंदी इन्ही दीवारों में गढ़ी जाती है ।
--------अनिल कुमार शर्मा


Saturday, 11 January 2014

खुले दरवाजे पर दस्तक दिया
वह बंद हो गया
उदार आदमी भी
अब इतना तंग हो गया
सवाल के सामने सवाल
और जबाब के सामने जबाब
मैदाने जंग हो गया
आदमी की फितरत में
खुला कलेजा बंद हो गया
किताबें खोलता हूँ
चमक आती है उम्मीद जगती है
जैसे तेज तूफान में
कोई ढिबरी जलती है
वह बंद दरवाजा खुलता है
उसका साँकल फिर
बंद होने के लिए झूलता है

Friday, 10 January 2014

हॉस्पिटल में पैदा हुआ
तबादले की मार सहता हुआ
किराये के घरों में रहा
होटलों में जन्मदिन से लेकर
विवाह ,तलाक ,पुण्यतिथि मनाता रहा
पंद्रह अगस्त ,छब्बीस जनवरी पर
जन-गण ,मन -गण गाता रहा
भारतमाता के जोरदार नारे लगता रहा
 सरकारी मुलाजिम का वेतन पाता रहा
बच्चों को पार्क में घुमाता रहा
जिंदगी में खुद को भुलाता रहा
दोस्तों से ग़मे -शिकवा गाता रहा
बेबुनियाद का पिकनिक मनाता रहा
कभी अस्पताल ,कभी दुकान , कभी मंदिर
बैंक से लेकर दफ्तर जाता रहा
सरकारी फरमान बजाता रहा
इसी तरह जिंदगी के अरमान सजाता रहा
आज इस उम्र के पर हूँ
खुद में नागवार हूँ
आज जिंदगी दवा पर चल रही है
जैसे सरकार किसी हवा पर चल रही है
हॉस्पिटल के बिस्तर पर साँस गिन रहा हूँ
यहीं पैदा हुआ था
आज यहीं छीन रहा हूँ
अब तो योजनाओं में विकास है
न खुश है न उदास है
भाई साहब मिडिल क्लास है ।

Thursday, 9 January 2014

हॉस्पिटल में पैदा हुआ
तबादले की मार सहता हुआ
किराये के घरों में रहा
होटलों में जन्मदिन
आदमी के भीतर हम आदमी कितने है
समय के चोट खाये मुरझाये फूल जितने है
काँटों के बहार में फँसी ये पँखुरियाँ
घायल बसंत के दर्द भरे घाव कितने है
मुझे हर घड़ी वह आदमी याद आता है
जो सिर्फ़ आदमी ही रह गया
आदमी  की देह ओढ़े
तमाम भेड़ियों की कहानी कह गया
मेरी मिट्टी मुझे तुझ पर भरोसा है
वह आदमी जरुर मिलेगा
इस बंजर में कोई फूल खिलेगा ।

Wednesday, 8 January 2014

आदमी के भीतर हम कितने आदमी है

चलो किसी की रब से बात तो होती है
रूह में ही सही मुलाकात तो होती है
कितने मंज़र गुजर गए आसमां के पार
कम से कम रब की जमीं पर बात तो होती है
मुझे दोस्ती और दुश्मनी में फर्क नहीं मालूम
एक हवा सी होती है एक ज़ज्बात सी होती है
किसके हिस्से में कितनी करामात सी होती है
 कहीं आँसू कहीं शबनम कहीं क़ायनात सी होती है
शुक्र ख़ुदा का कितने बयानात सी होती है



Tuesday, 7 January 2014

What I say  in principle
But not do in practice
To whom I say
And for whom I do
Always creates a confusion
I delve in reality better than illusion
Teachers are good
And my learning is better
But when I step in grass
Drops of mud sling on my feet
I wonder this ideal defeat
This is the bare truth of my life
What my rule fed behavior hide
I always say such and such
But do always as I had done
I am fed-up in these two poles
I hide my self in many holes
I disguise to myself
This is the wonder
I never seek any help
Anil Kumar Sharma
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Friday, 3 January 2014

ये खबरें आँधी सी चलती हैं
अखबारी नालों में
गंदे पानी सी बहती हैं
सड़े फलों के छिलके सी रहती है
इसकी बदबू से
हर सुबह महकती है
चिड़िया कहाँ चहकती है
इसमें कुछ नेता हैं कुछ चमचा हैं
कुछ खेल -खिलाड़ी हैं
कुछ बुद्धू और जुगाड़ी हैं
कुछ नंगें हैं कुछ नंगी हैं
कुछ भरे -पूरे ,कुछ भंगी हैं
सच कहते कुछ झूठे हैं
कुछ जनता की किस्मत लुटे हैं
कुछ साबुत हैं कुछ टूटे हैं
भगवान तुम्हारे धोखे में
बेटी की इज्जत लुटे हैं
हत्या है दंगे है
नए पुराने हथकण्डे हैं
क्या अखबारी दुनिया के -
हम बने कीट -पतंगे हैं ?
माहौल सँवरने में आए
कितने -कितने फंदे हैं
देखो कितना दिखता है
लिखता कम ज्यादा चीख़ता है
खबरों से ज्यादा अब
प्रचार यहाँ दिखता है
हर हाथों में रोज यहाँ बिकता है
नहीं कहीं कुछ टिकता है ।

ये खबरे आँधी सी चलती हैं
अखबारी नालों में
गंदे पानी सी बहती

Wednesday, 1 January 2014

मैं मौत को जीतने चला
शरीर को पीटने चला
शरीर के तत्व बिखर गए
आत्मा में निखर गए
एक ज्योति जल गयी
 उसमें शरीर पिघल गयी
देश काल विलीन हो गया
अमरत्व में लीन हो गया
मैं जहाँ हूँ वहाँ नहीं भी हूँ
एहसास होने लगा
उसी प्रकाश में
मेरा अंधकार खोने लगा
प्रभु तुमसे अभिषिक्त हूँ
स्वतः प्रदीप्त हूँ ।