Tuesday, 24 June 2014

भगवान ने कहा
भगवान को बताने वाले ने सुना
उसके कान में खोंट था
जीभ में लोच था
कितना सुना
और कितना कहा
प्रश्न यह है कि -----
केवल वह अपने लिए सुना
कि औरों के लिए भी  सुना
या वह  सबके लिए सुना
और अपने लिए ही  कहा
यही सनातन सत्य है
जो फिट है   वह फिट रहना चाहता है
जो फिट नहीं बैठता है
वह फिट को हिट करना चाहता है
परम्परा में सनातन सत्य
प्रभावी का पक्ष है
फायदा वाला रूढ़ है
घाटा  वाला प्रगतिशील है
विजेता और विजित
शोषित और शोषक
एक ही सिक्के के दो पहलू है
एक चित है
तो दूसरा पट है
यही संकट है
कि दोनों पहलू एक साथ नहीं होते
साथ साथ नहीं पाते
साथ साथ नहीं खोते
भीड़ के भुलावे में भीड़ परेशान है
अकेला तो और परेशान है
ज़माने का ज़माने पर एहसान है
नयी समझ और नया ज्ञान है
चिड़िया उड़ नहीं पाती
चींटी चल नहीं पाती
बन्दर गाँछ पर लटका है
यह अहसास अभी टटका है
भगवान  अभी भगवान  वाले में अटका है
 ईश्वर होने और न होने के मध्य
सवाल का दायरा इतना बड़ा
 जहाँ कि भूख का कोई हल नहीं
दर्शन दृष्टान्त तर्क -वितर्क
कुर्सी चाटते जीभ की ध्वनि
जो जमीं का खाती है
और आसमान बतियाती है
पुष्टिभोग के बाद स्वाद बदलता है
चिरंतन की जड़ता है
यही सच  है खुदा !
भगवान होने या न होने के बहाने
आदमी आदमी पर पड़ता है
अनिल कुमार शर्मा



Monday, 23 June 2014

एक महंगा आदमी है
और एक सस्ता है
एक और आदमी है
जो न तो महंगा है न ही सस्ता है
सिर्फ उसकी हालत खस्ता है
आँखे गीली है
जेब ढीली है
जिंदगी नीली -पीली है
सपने बुनता है
कुछ राहें चुनता है
समस्याओं की बरसात में
नमक के ढेले की तरह
रह रह कर घुलता है
किस्मत को कोसता है
बहुत दूर तक सोचता है
जिंदगी में जिंदगी को नोचता है
उसके कलेजे में कुछ कोंचता है
खुद रोते  हुए दूसरों का आंसू पोछता है
उसकी जिन्दगी अजीब है
उसे इस अँधेरे में भी उम्मीद है
अनिल कुमार शर्मा   24/06/2014

Sunday, 22 June 2014

यह दौर
और यह सवाल
 दोनों कितने खतरनाक है
सब कुछ सही लगते हुए
आखिर कहाँ इतना गलत हो जाता है
यह देखकर दिमाग चकराता है
सही गलत और गलत सही हो जाता है
कही का सियार कही का बाघ हो जाता है
फटी किताबो में घुन खाए अक्षरों की तरह
कुछ भकड़े हुए ईमानदार लोग
बेईमानी की चिकनी सतहों पर फिसल जाते है
बेईमान ईमानदार कहलाते है
ईमानदार बेईमान हो जाते है
सियासत के रासायनिक परिवर्तन का प्रभाव है
इस दौर का यही गुण -धर्म -स्वभाव है
और तुम सवाल पूछते हो ऐसा क्यों है ?
यह सही है सवाल मुखर है
जबाब मौन है
सवाल यह है कि
इस सवाल के घेरे में कौन है
मैं भी कतराता हूँ
तुम भी कतराते हो
और वह तो और कतराता है
अब इस सवाल का सामना
कोई भी नहीं कर पाता है
समय के कटघरे में
अब ऐसा क्यों है ?
यह सवाल पूछने में डर लगता है
मेरे दोस्त अब ये बता
तुझे यह दौर किस कदर लगता है ?
अनिल कुमार शर्मा


Saturday, 21 June 2014

When I came to my name
Bound with a lust of fame
I know such and so
In field with harrow and hoe
 Unearth the earth
Delve in the sky
Now I am so hi-fi
I am surrounded by toxins
Clouds with acid rain
Less pleasure much pain
With such big ozone hole
Melting both the pole
Damaging whole in whole
Alas! we have to progress
Now either play the digress
Come in nature with sharp razor
Pulled the stem and cut the root
This is our real science
And lament back in time
We are in search and research
Making our earth a desert
Anil Kumar Sharma
21/06/2014






Sunday, 15 June 2014

यह शहर है चोरों का
 घूसखोरों का लतखोरों का
जहाँ गंगा में गन्दी नाली बहती है
मंदिर के पीछे वेश्याएँ रहती है
जहाँ लड़की में मादा है
लड़को में नर आमादा है
यह देश काल का वादा है
नव युग का दादा है
पुलिस जहाँ की डरती है
गुंडे की ताकत बढ़ती है
नेता वैभव कीना है
अफसर बड़ा कमीना है
फिर भी जनता को जीना है
इसी जहर को पीना है
सड़को में खाई है
चेहरों पर झांई है
गाड़ी शीशे वाली है
गलियों में नाली है
हवेली खड़ी चमकती है
बदबू चहु ओर महकती है
कुछ कुत्ते है कुछ सूवर है
कुछ घूरे है कुछ घर है
कचरा और कबाड़ी है
कुछ गड्ढे है  कुछ झाड़ी है
जगह जगह सड़ता पानी है
ये शहर बड़ा खानदानी है
बिजली के खम्भे टूटे है
पेड़ जहाँ पर ठूँठे है
नक़्शे में हरियाली है
उकठे पेड़ों की डाली है
संस्कार जहाँ का खाली है
यह नगरी बड़ी निराली है
अनिल कुमार शर्मा
१६/०६/२०१४

Saturday, 7 June 2014

तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
 तुम मोहब्बत के चादर से ढक देती हो
मैं नफ़रत के पंजे से फाड़ देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
सलीके से खोलती हो दरवाजे को तुम
मैं धड़ाक से कुण्डी मार देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
आँचल से ढक के लौ को जलाती हो तुम
पछुआ हवा मैं झोक देता हूँ
पुरवाई की स्वागत में तुम लीपती हो आँगन
चौखट पर खड़ा होकर मैं रोक देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
आँगन में तुलसी को सींचती हो तुम
गमले में कैक्टस मैं रोप देता हूँ
आस्था की सफेदी लगाती हो तुम
बुद्धि की कालिख मैं पोत देता हूँ
तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ ?
अनिल कुमार शर्मा  ०८/०६/२०१४/
उत्तरआधुनिकता का समर्थक हूँ


मैं भाषा को तोड़ता हूँ
स्वर व्यञ्जन  मोड़ता हूँ
शब्दों में सार्थक कम, ज्यादा निरर्थक हूँ
उत्तर -आधुनिकता का समर्थक हूँ
अंको में बोलता हूँ , शब्दों में तोलता हूँ
संकेतों में इधर -उधर डोलता हूँ
खोखले प्रतीकों पर भुरभुराता बिंब हूँ
पानी के हलचल में हिलता प्रतिबिंब हूँ
साहित्य के कटोरे में , विभ्रम में तराशे हुए
चाँदी के शब्द सोने के भाव भरता हूँ
हक़ीक़त में जस्ते के टूटे बर्तनों में
जिंदगी के घुटते सांसों का हिसाब करता हूँ 
ज़मीं पर होते हुए ज़मीन पर होने में डर लगता है
बहुत दूर का आसमान अपना घर लगता है
पांव कीचड़ में सने है नज़र सितारों की सैर करती  है
अपनी गढ़ी हुई दुनिया इस दुनिया से वैर करती है
अपनी सिमटती जिंदगी अपनों से गैर करती है
भाषा और विभाषा का तर्क मिलाता हूँ
शब्दों को नया अर्थ पिलाता हूँ
पाले गए व्याकरण में विचित्र वाक्य बनाता हूँ
टूटते समाज के शब्दों को जोड़कर
नया सिंटेक्स बनाता हूँ
यह बात कितनी विचित्र लगती है
व्याकरण की भाषा कविता को ठगती है
ठगी हुई कविता आँसू बहा कर फिर से मुस्कुरा रही है
शब्दों के जाल से छनकर भावना बहा रही है
ठोस बर्फ छूने पर पिघल रहा है
कवि का हृदय उबलता वायु निगल रहा है
पिघलते पिघलते बिल्कुल अमूर्त हूँ
अपनी भाषा में स्वतः स्फूर्त हूँ
आदमी के टूटन का घुटन का प्रतिमूर्त हूँ
बाजार के चौराहे पर बैठी कविता
दीदा फाड़कर रो रही है
थकी हुई कलम गहरी नींद में सो रही है
आलोचना थ्योरी में खो रही है
नयी तरह की गोलबंदी हो रही है
कुछ कलम घसीटू रेवड़ी लिख रहे है
चिन्तनशील होने की चिंता में दिख रहे है
प्राचीनता को तोड़ता आधुनिकता
अब उत्तरआधुनिकता में बिखर रहा है
आदमी का नंगापन अब बेहतर निखर रहा है
महसूस होने तक महसूस में सिहर रहा है
सड़े साम्राज्य की कथा में बिहर रहा है
पहचान खो कर पहचान बनाने में परेशान है
"भड़ैती "का सिद्धान्त ढूँढता विद्वान है
टूट कर बिखरा हुआ ,ज़मीन छोड़कर निखरा हुआ
धुंध में ढका हुआ साफ सुथरा आसमान है
उत्तरआधुनिकता की रंगीन गड़ही में नहाकर
तरह तरह का पोशाक पहनता हुआ
कटी जुबान में बिना सिर पैर का इंसान है
महज़ वर्तमान में फिट होने की जिद है
अतीत से भागा हुआ अधर में लटका भविष्य है
चाक पर घूमता है एब्सर्डिटी में झूमता है
फटे होठ का खून चूमता है
हँसने के भ्रम में ज्यादा रो रहा है
लगता है घोड़ा बेचकर सो रहा है
अपनी छोटी पहचान को बड़ी पहचान से धो रहा है
आम उखाड़ कर बबूल बो रहा है
आदमी की समस्या रोबोट के आगे रो रहा है
अब तो आदमी की आदमियत फीकी है
यह तकनीकि सचमुच में तीखी है
अनिल कुमार शर्मा    26/12/2014



Wednesday, 4 June 2014

मेरे जहरीले शहर !
पूछते हो क्या हुआ है
जहाँ सुबह भी धुवां है
शाम भी धुवां है
जमीं पर जिनके पैर नहीं है
उनके गाड़ी के पीछे धुवां है
अब तो एक घर के जगह पर तीस घर  है
फिर भी आदमी बेघर है
गलियों में तमाम ब्रांडों के पॉलीथीन पटे है
संकरी जगह में घरों से घर सटे है
किन्तु आदमी आदमी से  कटे है
हम आधुनिक लोग तो
अपने कद से कुछ ज्यादा घटे है
चमकते जूतों के तलवे फटे है
क्यों हम अपनी जमीन से इतने कटे है
चहारदीवारी के बहार अविश्वास खड़ा है
गलियों में एक अजीब खौफ पड़ा है
हर जगह लगता है कुछ सड़ा है
साज़िशों की बदबू से दिमाग भरा है
क्यों इतना गुनाह हर जगह है
इसका गुनहगार कौन है
इस सवाल पर मेरे शहर !
क्यों इतना तू मौन है ?
अनिल कुमार शर्मा  ०४ /०६/२०१४

Monday, 2 June 2014

जबसे दूनो अंखिया क बउल भइल फ्यूज
रास्ता जपत चलेली प्लीज प्लीज एक्सक्यूज़
प्लीज प्लीज एक्सक्यूज़ जपत बस पर चढ़ली अकुता के
तौले ईगो बिटिया आइल हमरा के धकिया के
चिक्कन चिक्कन गाल लाल छींट क पहिनवा
बड़ी जोर से धकियावे एक त चले न तनिको हवा
हम कहली बाची होने जा खाली  बा सीट जनाना
एधिर कहाँ अइलू कुल्ह बाड़न मरदाना
आँख तरेरलस अगवा जाके भुसुराइल
अपनी जाने गरजलस बाकी बकरी अस मेमियाइल
बूढ़ा क्यों बक बक करता है ऑफ हुआ माइंड है
लइका को लइकी बुझता है पूरा पूरा ब्लाइंड है
ई कुञ्ज बिहारी क लाइन ह

Sunday, 1 June 2014

सुनो किसानों
सुनो किसानों ! कृषि प्रधान देश के कर्णधारों !
तुम्हारे खेत को कबूतर चुग गया
नयी रोशनी का सूरज उग गया
सड़ी रोशनियों वाली खिड़कियाँ बंद करो
और अँधेरा हो जाने दो
पुरानी रोशनी को एकदम खो जाने दो
नयी रस्सियों में अपने हाथ -पाँव  बाँधकर
उसका छोर मुझे दे दो
जिसमे गाँठ लगा सँकू
और उसे पेटेंट करा सँकू
गाँठ लगाने की तकनीक मेरी है
जिसमे कि तुम बँधे हो
तुम्हारे खेतों में उगे अनाज
मेरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी है
तुम्हारे पास सिर्फ तुम्हारी मेहनत
और तुम्हारे खेत की ऊसर मिट्टी है
नियम यह है कि बादल मैं बनाऊंगा
बरसात से तुझे बरकना होगा
तुम्हारे खेत में मेरे ही ट्रैक्टर चलेंगे
मेरा ही बीज और खाद छिड़कना होगा
तुझे फसल चरते भैंसे को रोकना होगा
मेढ़ को हर तरफ से तोपना होगा
तुम अपने ही खेत में बिजूके हो
पेट के सवाल पर क़र्ज़ के ब्याज में डूबे हो
चिथड़ों की गर्दिशे तुम्हे लुभाती है
पैदवार के नाम पर ----
सटे खेत का मेढ़ खुदवाती है
तुम्हारे खेत में खुले सांड़ है
घरों में पंचायत है
विकास होते हवा की यही इनायत है
बगल में ताड़ी खाना है
उससे सटा थाना है
तहसील है कचहरी है
पसीने से भींगते तन की आग हरी है
सड़ी जुबान में खोटी है खरी है
बस बात इतनी है कि
खेत में घुस गयी कोई बकरी है
तुम्ही गवाह और साबुत हो
निहायत गफलत इतनी ही
कि तुम मजदूर और किसान हो
 किसी जातिगत   ढांचे के बिधान हो
मेढ़ खोदकर मेढ़ बनाने में परेशान हो
जय मजदूर ! जय किसान हो!
अनिल कुमार शर्मा   ०१ /०६ /२०१४
( कंगाल होता जनतंत्र से पेज -105 )