Monday, 16 November 2015

उसके हाथों में कोई एक कहानी है
और उसके पास कुछ   बेबस जवानी है
उसे  कोई फर्क नहीं पड़ता इस ज़माने में
कितना बिगड़ जाता है कुछ बनाने में
अब तो आदमी की नस्ल  को आदमी ही खाता है
जाने किस पेट में पचाता है
कहीं से कोई बंदूक घूमाता है
आदमी के हाथ से आदमी को गिराता है
इस आदमी की बेबसी वह आदमी है
जिसके कलेजे में आग आँखों में नमी है
बारूद के टीले पर आशियाना बनाता है
मौत के साये में जीना सिखाता है
एक अजीब रास्ता दिखाता है
जहाँ खून की नदी बहती है
अब ये लाशें कहती है
अनिल कुमार शर्मा
17/11/2015




Saturday, 14 November 2015

मेरे जन्मदिन !
फिर आ गए उसी तरह
जैसे बार -बार आते हो
मुझे समय में चक्र की तरह घुमाते हो
धुरी और परिधि में कुछ अंक जोड़ जाते हो
इस संकुचित में कुछ विस्तार मोड़ जाते हो
मैं तो वही हूँ समय की दूरी में
जन्म के बाद हर साल बढ़ता हुआ
आसमान में सूरज की तरह चढ़ता हुआ
कभी बादलों में ढक जाता हूँ
समय की ऊंचाइयों में थक जाता हूँ
तुम्हारे आने से कुछ नयापन लगता है
बुढ़ाते समय को जैसे बचपन ठगता है
इस ठगे हुए समय में जी रहा हूँ
मित्र ! तुम्हारी शुभकामना पी रहा हूँ
इस देश ,काल के हम पात्र है
समय में बंधे हुए समय के छात्र हैं
जिसे अपनी नज़रों से पढ़ते हैं
इसे कई सांचों में गढ़ते हैं
जो ठोस होकर पिघल जाता हैं
पिघला हुआ भी ठोस हो जाता है
समय के इस आगोश में
किसका समय कहाँ खो जाता है
समय की निरंतर शिला  पर तुम
समय की धार की तरह टकराते हो
मेरे जन्मदिन ! फिर आ गए
उसी तरह जैसे बार -बार आते हो ।
अनिल कुमार शर्मा
१४/११/२०१५
४३ वां जन्मदिन


Friday, 6 November 2015

मेरे मित्र तुम क्या -क्या खाते  हो
और क्या क्या पचाते हो
कुछ तो पच जाता होगा
कुछ बिना पचे बच जाता होगा
तुम्हारे आहारनाल में
धर्मों के खाद्य अखाद्य पचकर
क्या आत्मा तक पहुँच जाते है ?
गढ़े हुए परमात्मा को खुजलाते है ?
लोग इतना क्यों झुंझलाते है
थाली में बवाल मचाते है
भोजन , भजन और भाजन
चय में उपचय और पाचन
आहार- विहार में संहार
और वसुधैव कुटुम्बकम का संस्कार
सीना ठोंककर गाते है
मनुष्य से गिरकर मवेशी तक आते है
और नायं हन्ति न हन्यते बताते है
एक खास पशु की प्रतीति में
इंसान को मारते है काटते है
अंहिंसा परमोधर्मः बाँचते है
एक विचित्र विश्वास लादते है
धर्मपाश का सत्ता संधान
जिसमे भोजन और स्नान
बन जाता शास्त्र ज्ञान
जिसे लोक पर लादते रहो
और अपनी पोथी बाँचते रहो ।
अनिल कुमार शर्मा
06/11/2015

Wednesday, 4 November 2015

कुछ पुरस्कार लौटा रहे हैं
तो कुछ तिरस्कार लौटा रहे हैं
लो हम सारा सरोकार लौटा रहे  हैं
इस ज़मीन के मूल्यों से हट कर
उनकी गढ़ी हुई कोई ज़मीन है
जिस पर पौधे जमने से कतराते है
वे लोग तो गमलों में कुछ ज़मीन लगाते हैं
छुरी कैंची उनके पास है
काट- छांट में विश्वास है
कहते है समाज सबका है
किन्तु तरीका तो उनका है
कुछ निरा बुद्धिभक्षी हैं
कुछ छद्म बुद्धिरक्षी है
स्वयं को कहते बुद्धिजीवी हैं
इनमें अधिकतर तो गोष्ठीजीवी हैं
पहचान के लिए परेशान है
ये विचित्र इंसान है
खाली डिब्बे से घूरों पर पड़े है
रद्दी किताबों की तरह
किसी गोदाम में सड़े हैं
किसी ऊबन की तरह महक रहे हैं
बिना रास्ते के ज्यादा बहक रहे हैं
लगता है पैरों तले ज़मीन खिसक रही है
उनके गमलों की मिटटी सिसक रही है
नए पौधे जमने से कतराते हैं
पुरुषार्थहीन छटपटाते हैं
बन्दर की तरह कटकटाते है
इस डाल से कूदकर
उस डाल पर जाते हैं
फिर उसी डाल पर वापस आते हैं
 विचित्र इनके रिस्ते हैं
गज़ब इनके नाते हैं
एक बात को उगल कर
पुनः उसी बात को खाते हैं ।
अनिल कुमार शर्मा
04/11/2015

Tuesday, 3 November 2015

किस बंधन में बँधा प्रिये
सुरभित सरस  डोरे से
कुञ्चित कच उर्मिल उर पर
स्पंदित मंद हिलोरे से
व्याकुल कर देती स्मित मंद
तेरी अधरों के कोने से
मंजु मनोहर  भाल प्रभा
आशिष कृष्ण के बाल सखा
यमुना तट के  कदम्ब कुञ्ज में
कुसुमित सुमन पर भ्रमर गूँज में
अन्तस्तल में मधुर राग बजाती हो
सुभग अनुराग जगाती  हो
 मधुपुरित ये नयन खुले
प्रिय मेरे मन के राह भूले
भंवरजाल इन केशों में 
मंद नयन उन्मेषों में
कितनी मादक  लगती हो
माया वन में खिली कुसुम सी
मुझ  भौंरे   को ठगती हो
ऊर्ध्वाधर प्रेम शिखर सी
कितनी विह्वल लगती हो |
अनिल कुमार शर्मा
03/11/2015



Sunday, 1 November 2015

मुख मयंक को मैंने देखा
प्रिय! अपनी मधु चक्षु कोटर से
श्याम मेघ में तड़ित सी
कोमल पलकों का खुलना था
स्मित अधरों पर मुक्तावली सी
चटक पंखुरियों में खिलना था
मोहक मन की मधु स्मृतियाँ
सरसिज उर पर खिली हुई
पुष्ट प्रेम की मंडप सी
उच्छ्वासों में तनी हुई
अमृतमय घट द्व्य
प्रेम पूरित तन्मय
नीहारिका  सी रजनी में
पुष्पवास सी मोहक हो
रजनीगंधा सी महमह करती
प्रिये! कितनी सम्मोहक हो ।
अनिल कुमार शर्मा
०१/११ २०१५