Friday, 29 August 2014

At the beginning of the last time
I would like to be lost in the dim
As I came from the almost dark
Live long to seek the light
 The destiny of my last moment
Do not know whether light or dark
This is the reason of a hark
All my deeds directed in the flash
And resulted in a supper clash
As I sensed temporal light and dark
And pass through the mundane park
All sense sublimated in the fume
 At the juncture of light and dark
Like a blind dog to the delicate air
Do nothing but only bark and bark.
 Anil Kumar Sharma
30/08/2014



 

Thursday, 28 August 2014

उस भूख से चलकर
 अब  इस भूख तक आ गया हूँ
लगता  है समूचा दौर खा गया हूँ
 वही प्रश्न  बार  बार दुहराते हुए
इस कदर उकता  गया हूँ
कि कोई प्रश्न शेष नहीं है
उत्तर भी अवशेष नहीं है
आसमान की उम्मीद में
जमीन सरक गयी
अब तो खुशी के सब खिलौने
बिलकुल उदास पड़े है
उम्मीद की झोपड़ी में
सिर्फ खोखले विश्वास पड़े है
आँधियाँ चल  कर रुक गयी
तनी टहनी हिलकर  झुक गयी
पत्ते बहुत उदास है
फूल भी निःश्वास है
थोड़ी सी महक का भरोसाहै
बस इतनी सी उम्मीद को पोसा  है
अपनी जमीन में कोई दम है
 नहीं किसी का गम है ।
अनिल कुमार शर्मा
28/08/2014


 

  
 




  

Tuesday, 26 August 2014

भगवान ने कहा
भगवान को बताने वाले ने सुना
उसके कान में खोंट था
जीभ में लोच था
कितना सुना
और कितना कहा
प्रश्न यह है कि -----
केवल वह अपने लिए सुना
कि औरों के लिए भी  सुना
या वह  सबके लिए सुना
और अपने लिए ही  कहा
यही सनातन सत्य है
जो फिट है   वह फिट रहना चाहता है
जो फिट नहीं बैठता है
वह फिट को हिट करना चाहता है
परम्परा में सनातन सत्य
प्रभावी का पक्ष है
फायदा वाला रूढ़ है
घाटा  वाला प्रगतिशील है
विजेता और विजित
शोषित और शोषक
एक ही सिक्के के दो पहलू है
एक चित है
तो दूसरा पट है
यही संकट है
कि दोनों पहलू एक साथ नहीं होते
साथ साथ नहीं पाते
साथ साथ नहीं खोते
भीड़ के भुलावे में भीड़ परेशान है
अकेला तो और परेशान है
ज़माने का ज़माने पर एहसान है
नयी समझ और नया ज्ञान है
चिड़िया उड़ नहीं पाती
चींटी चल नहीं पाती
बन्दर गाँछ पर लटका है
यह अहसास अभी टटका है
भगवान  अभी भगवान  वाले में अटका है
 ईश्वर होने और न होने के मध्य
सवाल का दायरा इतना बड़ा
 जहाँ कि भूख का कोई हल नहीं
दर्शन दृष्टान्त तर्क -वितर्क
कुर्सी चाटते जीभ की ध्वनि
जो जमीं का खाती है
और आसमान बतियाती है
पुष्टिभोग के बाद स्वाद बदलता है
चिरंतन की जड़ता है
यही सच  है खुदा !
भगवान होने या न होने के बहाने
आदमी आदमी पर पड़ता है
अनिल कुमार शर्मा



Monday, 25 August 2014

किस घर से किस घर की बात करूँ
एक उजड़ा है एक बना बनाया है
एक जन्म लिया तबसे भूखा है
एक पेट से ज्यादा खाया है
एक ब्रह्म है दूजा माया है
 जीवन क्या तू एक छाया है?
परितोष किसे कब क्यों है
दुःख कातर मन भी क्यों है
दिन है और रजनी है
साजन है और सजनी है
मन भटका है अवरोधों में
 ज्ञान दृष्टि और शोधों में
अब तो आकुल अंतर है
 जीवन जल प्रांतर है
 मन बिचलित तन बोझिल है
किस पर कितना विश्वास करूँ
किस घर से किस घर की बात करूँ ।
अनिल कुमार शर्मा  २५ /०८/२०१४/


Friday, 22 August 2014

She told me something untold
With her speaking eyes and smiling lips
Tongue never moved and utter a voice
I felt an unheard rejoice
Flunked by sense of capture
Dismantled with awe of prate
Snooze in the air so fair
Meet in bosom a gold nugget
Shivering hands and shrinking lips
I felt petals of rosy cheeks
Smell of breathe and tune of heart
We come within defying the firth
Thus we feel and talk nothing
Is this to love something?
Anil Kumar Sharma 23/08/2014

Wednesday, 20 August 2014

It is cold summer
So cold with sweat
Choking breathe
And surfing heat
I feel a lot of nothingness
Where I born
And where I will be dead
Eating life long bread
My life is sown in my soil
Thus I bloom and bear fruits
May it happen likely
That I never sprout
Nothing will be come out
I shall remain with all without .
Anil Kumar Sharma 21/08/2014










Sunday, 17 August 2014

दीवारें  भी कुछ सुनती है
हवाएँ भी कुछ गुनती है
रोज -रोज मधुबन में
कुसुम कौन सी चुनती है
कितने दीपक झंझावातों में
बुझ विलीन हो जाते है
मधु मोहित स्मित कपोल
सुख कर मुरझाते है
यह यातनाएं जीवन की
बद्ध कम्पित मोह पाश में
क्षण भंगुर काया के
विलास आरूढ़ संत्रास में
कुछ मधु पराग जीवन के
संभावित सुख चुनने को
आये है दिनकर के द्वारे
रश्मि प्रभात बुनने को
मेरे सविता प्रकाशपुंज
मुझको आलोकित कर दो
मेरे मन के गहन कोष में
हटा अंध प्रकाशित कर दो |
अनिल कुमार शर्मा
18/08/2014

Thursday, 14 August 2014

मेरे स्वप्नों में पले जय हिन्द
 यथार्थ की पीठिका पर
कितने भिन्न हो ?
आदर्श गर्भ सिंचित
अब विद्रूप विकार में लय हो
मैं  ढूढ़ता   हूँ   इतिहास संचित
बलिदानों का वह राष्ट्रीय चरित्र
जो नेतृत्व के विकार में बह गया
सिर्फ बंजर  प्रतिकार में रह गया 
क्या जय हिन्द  तुम्हारी आत्मा
सिर्फ   विदेशी विनिवेश में सिमटी है
  सरकार किसी अदृश्य के हाथ में
चलती हुई चिमटी है
जनता सहमी है सिमटी है
भूख के दायरे भी  कितने कीमती है
सिकुड़े हुए पेट पर बाजार हावी है
यही बात बड़ी  प्रभावी है
जिसे जो बुरी लगती  थी
उसे बुरा कह कर उससे भी बुरा हो गया
अब वह अच्छा दिन कहाँ खो गया
मेरे जय हिन्द ये बता
अब तुझे क्या हो गया ?
अनिल कुमार शर्मा  14/08/2014

 

Monday, 4 August 2014

मैं समय के साथ चल रहा हूँ
अपना खाली  हाथ मल रहा हूँ
जिसे मूल्य समझकर सहेजता रहा
वह कौड़ी का तीन हो गया
एक तो करैला दूसरे चढ़े नीम हो गया
जिसे सोचकर लाज लगती थी
अब सरेआम हो रहा है
लगता है इस दौर में
 बहुत कुछ खो रहा है
खोद कर गढ़े गए इतिहास में
क्यों भविष्य रो रहा है
अब तो बस यही है
जो कह सको कहते रहो
बच बचाकर रहते रहो
एक अदद ज़िन्दगी में गुजरते रहो
ख्वाब को हक़ीक़त से कुतरते रहो
जिंदगी की आश में घुटते रहो
मौत के सिकंजे में टूटते रहो
जो है उसे स्वीकारने में
नमक की हाड़ी की तरह गल रहा हूँ
मैं  समय के साथ चल रहा हूँ
अपना खाली हाथ मल रहा हूँ
अनिल कुमार शर्मा
०४/०८/२०१४

Sunday, 3 August 2014

वह मन्त्र मुग्ध सा दिन जीवन का
मित्र जब तुम मिले मुझसे पहली बार
मुझे  लगा पा  गया  विस्तार
अपने स्वत्व के प्रांगण में  
आत्मा में अतिक्रमित कर गया
गोपनीयता के खोल में बंद
संवेदना के   गुह्य  रत्न
खोल दिया विश्वास के  कोषागार में
एक  सुखद संतोष के  आगार में
मित्र वह तुम थे जहाँ मैं विस्तृत हो गया
तुम्हारे अस्तित्व में खो गया
अब तो एक प्राण दो देह है
मेरे और तुम्हारे बीच
नहीं कोई संदेह है
अनिल कुमार शर्मा
03/08/2014






Friday, 1 August 2014

पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही छोड़ दिये ?
गबन और गोदान के बीच में
मंगलसूत्र टूट गया
वह कौन है ?
जो धनिया और होरी को लूट गया
गोबर तो मॉल में सड़ रहा है
मातादीन आज भी वही पोथी पढ़ रहा है
सिलिया के चक्कर में पड़ रहा है
मेहता और मालती सरेआम घूम रहे है
चौराहे पर एक दूसरे को चूम रहे हैं
 ओंकारनाथ तुम्हारी बिजली
गरीबो को करेंट मारती  है
अमीरों के आगे दाँत चियारती है
हलकू फांसी के फंदे में झूल रहा है
सोहना  बहुराष्ट्रीय में  फूल रहा है
 पंच में से परमेश्वर गायब है
न्याय में सही गलत सब जायज है
 ईदगाह में चिमटा है
 अब कर्मभूमि में काले खां 
सहमा है सिमटा है
झूरी  के पास न हीरा है न मोती है
इज़्ज़त पर एक फटी धोती है
 नमक का दरोगा
अलोपदीन के पानी में घुल रहा है
सारा वसूल भूल रहा है धनिया और झुनिया रोती है
बूढी काकी भूखे पेट सोती है
भगत की मन्त्र सूखी  घास है
सियासत की रंगभूमि में टूटता
आज भी बेचारा सूरदास है
प्रेमचंद आज भी  वही फ़न है
मरते समाज में   कफ़न है
जान से कीमती आलू है
आज भी वही दास्तान चालू  है
 तुम्हारे   ज़माने के सब सपने
उदारवाद में सड़कर फूल गए
पांडेपुर के चौराहे वाले प्रेमचंद
क्या लमही भूल गए ?
अनिल कुमार शर्मा
31/07/2014