मेरी जिह्वा की प्रत्यञ्चा से
उद्बुद्ध शब्द-बाण
मुझे ही बेधते है
अब मैं पराजित स्वप्न का
एक खोखला भविष्य हूँ
तुम्हारे में और मेरे में
दृष्टमान निषिद्ध हूँ
प्रवाहमान प्रकाश में सनिद्ध हूँ
किन्तु क्यों पाषाण में भी
संवेदना उकेरते हुए मैं
प्रतिमा के भाव से मूर्तिबद्ध हूँ
कठोर तत्व के सद्धभावदर्श
कर सकोगे अवगाहित
मेरे कोमल स्पंदन के भाव
मेरे अस्तित्व पर उठे
मेरे ही शब्दवाण से
कर सकोगे मेरा परित्राण ?
अनिल कुमार शर्मा 22 /07 /2014
उद्बुद्ध शब्द-बाण
मुझे ही बेधते है
अब मैं पराजित स्वप्न का
एक खोखला भविष्य हूँ
तुम्हारे में और मेरे में
दृष्टमान निषिद्ध हूँ
प्रवाहमान प्रकाश में सनिद्ध हूँ
किन्तु क्यों पाषाण में भी
संवेदना उकेरते हुए मैं
प्रतिमा के भाव से मूर्तिबद्ध हूँ
कठोर तत्व के सद्धभावदर्श
कर सकोगे अवगाहित
मेरे कोमल स्पंदन के भाव
मेरे अस्तित्व पर उठे
मेरे ही शब्दवाण से
कर सकोगे मेरा परित्राण ?
अनिल कुमार शर्मा 22 /07 /2014