Monday, 21 July 2014

मेरी जिह्वा की प्रत्यञ्चा से
उद्बुद्ध शब्द-बाण
मुझे ही बेधते  है
अब मैं पराजित स्वप्न का
एक खोखला भविष्य हूँ
तुम्हारे में और मेरे में
 दृष्टमान  निषिद्ध हूँ
प्रवाहमान प्रकाश में सनिद्ध हूँ
किन्तु क्यों पाषाण में भी
संवेदना उकेरते हुए मैं
प्रतिमा के भाव से मूर्तिबद्ध हूँ
कठोर तत्व के सद्धभावदर्श
कर सकोगे अवगाहित
मेरे कोमल स्पंदन के भाव
मेरे अस्तित्व पर उठे
मेरे ही शब्दवाण से
कर सकोगे मेरा परित्राण ?
अनिल कुमार शर्मा 22 /07 /2014


Saturday, 19 July 2014

लोगों को मैंने हँसते देखा रोते देखा
पैर पसारे सोते देखा
अपने -अपने में खोते देखा
इस दुनिया के कोने कोने में 
रोज चीर -हरण होते देखा
गिरे हुए इंसानो के
कुकर्मों को होते देखा
दानवता को जीते देखा
मानवता को मरते देखा
हम किस खेत के मूली है
हम किस व्यवस्था के कुली है
जिसको ढोते रहते है
हम तो रोते रहते है
अनिल कुमार शर्मा १९/०७/२०१४


Tuesday, 15 July 2014

शून्यांक- त्रुटि
पोशाक अलग -अलग है
सिर्फ एक ही खूँटी है
सरकारी यन्त्र में भ्रस्टाचार
एक शून्यांक त्रुटि है
जो इसके हर पुर्जे में व्याप्त है
मानक के सापेक्ष सदा अपर्याप्त है
इस यंत्र में हम सभी यंत्रवत है
इतने संघर्षों के बाद भी
घर्षणविहीन जड़वत है
जो जिधर चल दिया चलता रहा
दोस्त तू जड़त्व में हाथ मलता रहा
इस विकासवाद की गर्मी से
मेरे सपनों का हिमालय पिघलता रहा
अब जर्जर दीवारों पर रंगीन पुट्टी है
लक्ष्य  और प्राप्ति के बीच
सिर्फ शून्यांक त्रुटि है
अनिल कुमार शर्मा 16/07/2014
 


Saturday, 12 July 2014

अच्छे दिन !
 आप की नज़र किधर है
मोदी की सरकार इधर है
हम तो कल भीड़ थे
 आज भी भीड़ हैं
 एक  अजीब सी चिढ़ है
सत्ता के भीतर
और  सत्ता के  बाहर
अलग -अलग नीड़ है
नादान पक्षी
तुम्हारी  यही तक़दीर है
दाने  के ऊपर जाल है
दोस्त क्या  हाल चाल है
हम तो पिचक गए
उसका फूला गाल है
अच्छे दिन !
क्यों इतना बुरा हाल है
अनिल कुमार शर्मा


 

 
 


 

Friday, 11 July 2014

Beyond Language

All languages are human
If you say humane
I understand that
Language does not matter to me
I see your lips and eyes
Feel the beat of heart
And observe the rhythm of breathe
I understand you such and so
That no word or language can translate it
I express you half and feel full
Thus differs my tone to known
Merge in better unknown
Where I know all but express nothing
I feel my language lacks something
All I grasp and part I express
What I want never manage
I want to say beyond language
Anil Kumar Sharma
11/07/2014









Wednesday, 9 July 2014

सुनो कॉमरेडों
क्रांति के मतभेदों
तुम्हारे लाल झंडे के
कई टुकड़े हुए
हम रह गए
मात्र डंडे पकड़े हुए
अब क्रांति तुम्हे गरियाती है
भूख हाथी पर बैठ कर जाती है
कभी साइकिल चलाती है
लालटेन जलाती है
तीर धनुष चलाती है
कमल सूंघती और सुंघाती है
जनता से सरकार
और सरकार से जनता में
पकाती है खाती है
फूटपाथ पर
चक्कर लगाती है
अनिल कुमार शर्मा 10/07/2014

Monday, 7 July 2014

 झोपड़ी वालों
तुझे महलों से प्यार करने का हक़ नहीं है
व्यवस्था ऐसी है कि नफ़रत भी नहीं कर सकते हो
सिर्फ महलों की ऊंचाई के लिए मर सकते हो
अनिल कुमार शर्मा

Thursday, 3 July 2014

आप कह कर चुप हो गए
मैं सुनकर चुप हो गया
चुप होने के अलावा कोई चारा नहीं था
कुछ देखने लायक नज़ारा नहीं था
पेट और जेब के अनुपात में
सरकारी बटुआ खाली है
सपने दिखाने के दांव -पेंच में
बनायीं गयी हवा अब जाली है
कहर कहने से कम नहीं होता
हक़ीक़त जानने वाले के ज़ेहन में
हक़ीक़त में कोई गम नहीं होता
सूखाग्रस्त सूखे खेतों के परे
साहबों के गमलों में खिले गुलाबी आँकड़े
ज़मीन से हट कर कुछ और बोलते है
विकासशील देश में विकास खोलते है
पूंजी निवेश के जुगाड़ में
पाला बदल कर बोलते है
दुकान और देश के बीच जनता सवाल हो
आलू ,प्याज ,तेल में बेहाल हो
उसे फायदे के हिसाब से बेचने का हक़ है
मुझमें खरीदने की कूबत नहीं रही
अब सारी योजनाये बाज़ार में बही
उसे तो बस दिखाने के लिए दुःख है
मेरे भूख के खाते में भूख ही भूख है
पकवानों के इश्तेहार से छला गया
अब मैं लार टपका रहा हूँ
कुछ कहने में ज्यादा सकपका रहा हूँ
अनिल कुमार शर्मा (04/07/2014)

Wednesday, 2 July 2014

थोड़ी भूख बाकी रहने दो
पूरा पेट मत भरो
कुछ दिमाग खाली रहने दो
जहाँ नए विचार प्रवेश पा सके
नए स्वाद को इत्मीनान से खा सके
अब दुनिया ऊबी -ऊबी सी है
गहराई में गहरी डूबी -डूबी सी है
ढाक के तीन पात जैसी
मुरझाकर झुकी -झुकी सी है
ये किस प्रगति का गीत गा रहे है
अपने नस्ल का क्यों बीज खा रहे है
हरे -भरे खेत में मुरझाया खेतिहर खड़ा है
उसके उम्मीद से क़र्ज़ का ब्याज बड़ा है
फसल को पानी देने में उसका पानी मर गया
गमछा फट गया कुर्ता भी सड़ गया
क्यों नंगा सीना ताने खड़ा है
बिना बेंट का फावड़ा है
बीमार बीबी खेत में खिलाती है
कुँवारी बेटी खेत में रुलाती है
महँगाई यमदूत की तरह बुलाती है
बाजार उसकी आँखे खुजलाती है
समस्याएं टाँग हिलाती है
एक खुराक जिंदगी मौत को पिलाती है
यह मामला भी खूब है
लुभाती हुई ऊब है
राजनीति जनेऊ पहनकर
उससे व्रत करा रही है
अच्छे दिन दिखाकर
वोट का दान पा रही है
पूरे खेत समेत उसको खा रही है
अनिल कुमार शर्मा  02/07/2014